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हे मीत मेरे

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Hindi Poetry
 
  
(१)
खून के रिश्ते भि फीके पड़ गए |
धर्म के नाते भि धुंधले हो गए ||
जब नहीं धन गिरह में बाकी रहा  |
मित्रता के मायने  भी  खो  गए ||
(2)
मित्रता तो मीत अब नंगी कटारी |
अवसरों  की बाट जोहे उम्र सारी ||
मिलते ही मौका जिगर कहते हैं जिसको |
पीठ में उसके हि सीधे घोंप मारी ||
(3)
मीत मेरे बनके फिर नादान  तुम |
भूलकर भी मित्रता करना न तुम ||
मित्रता के मायने अब भिन्न हैं  |
शब्द की मंशा भि देखो खिन्न तुम |

One Comment

  1. Vishvnand says:

    मित्रता पर सुन्दर ह्रदयस्पर्शी कटाक्ष,
    बढ़िया अर्थपूर्ण कविता
    मनभावन; हार्दिक बधाई.

    दोस्ती का गम नहीं अब, जब से जाना ये सही,
    दोस्ती है भूल जाना मतलब निकल जाने के बाद ….

    (कृपया font साइज़ बढ़ा दीजिये. बहुत छोटी है)

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