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नव गीतिका

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जब हुए चर्चे तभी पहचान उन की हो सकी
वरना उन को इस शहर में जनता ही कौन था
चोट खा दुनिया से उन का मन भी हल्का हो गया
वर ना मन के बोझ को पहचानता ही कौन था
हाथ सब ने ही उठाये थे समर्थन के लिए
सच जो कहता खड़ा हो शख्श ऐसा कौन था
सब तरफ बस एक ही चर्चा रही इस शहर में
कर दिया बदनाम मुझ को दोस्त ऐसा कौन था
नाम क्यों लेता किसी का जब हुआ बदनाम मैं
थी पता मुझ यह साजिश में शामिल कौन था
बढ़ रही थी भीड़ बिन सोचे उसे जाना कहाँ
रोकता जो भीड़ को वो शख्श ऐसा कौन था
आग को पी कर भी वो जिन्दा रहा दरसाल दर
एक मैं हूँ दूसरा तुम ही बताओ कौन था
बिन बताये नाम मेरा लिख दिया उस बुत पर
पर समझ आया नही वो लिखने वाला कौन था
इस शहर में हादसे का वक्त तुम से क्या कहूं
हादसा जब न हुआ हों वक्त ऐसा कौन था
दोस्त था दुश्मन था इस का फैसला कैसे करूं
दे गया जो फूल मेरे हाथ में वो कौन था
दोस्त था दुश्मन था इस का फैसला कैसे करूं
दे गया जो दाद मेरे शेर पर वो कौन था
याद मुझ को कहाँ थी मेरे जन्म दिन की तिथि
दे गया मुझ को बधाई शख्श ऐसा कौन था

3 Comments

  1. हरीश चन्द्र लोहुमी says:

    बहुत सुन्दर रचना डाँक्टर साहब ।
    p4poetry.com के इस मन्च पर आपका हार्दिक स्वागत ।

  2. prachi sandeep singla says:

    अच्छी लगी 🙂

  3. Vishvnand says:

    सुन्दर मनभावन
    अलग और नवीन ढंग की
    यह रचना बहुत सुन्दर लगी
    हार्दिक बधाई

    और आपका p4poetry पर हार्दिक स्वागत

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