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भाग्य

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Hindi Poetry

मेरी बीवी,
खाना बनाती है,
कपडे धोती है,
भाग्य की बात है।

मेरी बेटी,
चाय भी नहीं बनाती,
खाली प्याला भी नहीं उठाती,
भाग्य की बात है।

लगता है,
भाग्य करवट ले रहा है,
लड़की-लड़के के अंतर को,
मिटा रहा है।

सदियों के गलत को,
जो भाग्य हो गया था,
अब भाग्य-विधाता उसे,
बदल रहा है।

6 Comments

  1. prachi sandeep singla says:

    जब बेटी भी किसी की बीवी हो जाएगी तो वो भी ये सभी काम करेगी,,अपनी माँ के ही जैसे (चाहे बेटी कामकाजी भी क्यों ही न हो ).. 🙂

  2. Vishvnand says:

    अच्छी वैचारिक रचना
    बधाई
    पर भाग्य विधाता नहीं
    परिवर्तन ही सब बदल रहा है
    ये बहुत अच्छी बात है
    पर बुरी बात ये है
    कि कई अच्छी प्रथाएं भी
    परिवर्तन बिगाड़ रहा है …..

  3. dp says:

    जीजाबाई नहीं रहेगी, शिवा कहाँ से आयेगा,
    जब बेटी ही नहीं रहेगी, बहू कहाँ से लायेगा.

    अछि कविता बधाई.

    • s c kakar says:

      @dp, thank you for a favourable response. daughters will always be there. wives as we know them now may undergo an recognizable transformation

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