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*****घर जाने दे छोंड मोरी बँइयाँ*****

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Hindi Poetry

*****घर जाने दे छोंड मोरी बँइयाँ*****

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 घर जाने दे छोंड मोरी बँइयाँ ,

विनति करति तोरे पइयाँ पड़ति हूँ ,

मोहन सों झगड़इया,

        घर जाने दे छोंड मोरी बँइयाँ ।

नगर-नगर के लोग सुनेंगे ,

चरचा करेंगी ब्रज- नारियाँ ,

जाओ जी जाओ तुम पाओगे गारियाँ,

मोहन मुरलि – बजइया ।

              घर जाने दे छोंड मोरी बँइयाँ ।

जाकर मात जसोदा सों कह दूँ ,

फ़ोरत मटकि, नन्द नन्दन यूँ ,

रह-रह खींचत चुनर सारियाँ

हाथ सों तारि बजइया ।

               घर जाने दे छोंड मोरी बँइयाँ  ।

 *****भावना*****

7 Comments

  1. siddhanathsingh says:

    मनोहर चित्रण और भावनात्मक कविता.

  2. dp says:

    Jai Ho !!!!

  3. Harish Chandra Lohumi says:

    बहुत खूब !!! सुन्दर चित्रण एक गोपी की व्यथा का !!!
    बधाई !!!!

  4. Ravi Rajbhar says:

    Bahut Khoob bhawna ji,
    likhate rahiye 🙂

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