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मै ओर मेरे सपने …

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Dec 2011 Contest, Hindi Poetry

मै ओर मेरे सपने …

 

कहते है सपने होते झूठे

पर मुझे लगते बड़े अनूठे

नियति पर निर्भर तन है सोता

परबस मन नित सपनो में है खोता

जहाँ अहसासों की गागर

छलका करती हर पल

सारे जहाँ की खुशियों से

भर जाता रीता आँचल

कल्पनाओं के विटप की छाया

मन-आँगन में नित बिछती

झंझावतों की कर्कश ध्वनी

मधुर रागिनी में बदल रीझती

भले पराई हो दुनिया जब

कोई साथ ना हो अपने

जमती सपनो की महफ़िलें तब

अरमान लगते मचलने

जाने कहाँ कहाँ की सैर

सपनो के रथ चढ़ कर करते

इधर उधर मुड़ती राहे

मनचाहा हासिल कर लेती

सुधियों के बिखरे मोती

आँचल में समेट भर लेती

खुशियों का आलोक मधुर

सुख स्वप्नों में झरने लगता

जीवन की बगिया में कितने

रंग गंध भरने लगता

मै ओर मेरे सपने ….

कितना सकून मिलता है जब

हम स्वप्न में होते है

उन चन्द पलों में तब

अपनी पूरा जीवन जी जाते है

अच्छा होता,जीवन से गर

हकीकत शब्द मिट पाता

सपनो की दुनिया में ही

सारा जीवन टिक जाता

सत्य में जो ना मिल पाता

सपनों में बिन प्रयास मिल जाता

खुशियों का सौपान होते है

ये खट्टे मीठे सपने

जहाँ न होती खोने पाने की फ़िक्र

न होता हार जीत का जिक्र

बस बहते जाते जिधर

ये सपने ले जाते , बेफिक्र

मै ओर मेरे सपने …

संतोष भाऊवाला

2 Comments

  1. rajendra sharma 'vivek' says:

    अच्छी रचना
    संतोष जी सपने में खोने के लिए कुछ नहीं होता
    बिना प्रयास ही सब कुछ मिल जाता है किन्तु सपने भावी का संकेत होते है

    • santosh bhauwala says:

      आदरणीय विवेक जी ,आपको रचना पसंद आई, आभारी हूँ !!
      सदर संतोष भाऊवाला

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