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‘पलाश’

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Hindi Poetry

रोज उड़ने  का सपना देखकर  खुश होती हूँ |
भूल जाती हूँ  उड़ने को एक अदद ‘आकाश’  चाहिए ||

रातों  के   ख्वाब  दिन  की  उमंग से  भरपूर  है |
हरा सके जो हौसलों को,बस ऐसा एक ‘काश!’ चाहिए ||

रस्सी  हूँ  पर पत्थर  की,  बल  खोल  ना पाओगे |
शर्त बस इतनी मेरी, जला दे मुझे, वो ‘आग’ चाहिए ||

क्यों बेसब्र  है  आँखे ‘शिप्रा’,    दुनिया असल  दिखती  नहीं |
कुसूर इतना तो तुम्हारा है, आइना भी तो ‘शफ्फाक’ चाहिए ||

बहारों ने कब इनकार किया, तपती धुप में आने को |
पर  दिले-सहरा को  खुशनुमा  रजामंद  एक  ‘पलाश’    चाहिए ||

 

3 Comments

  1. siddhanathsingh says:

    कहीं “काश चाहिए” और कहीं “पलाश तो चाहिए” दोनों में तुक भंग है अर्थात रदीफ़ काफिये अथवा अन्त्यानुप्रास की समझ में कमी प्रदर्शित करती है, कृपया थोडा छंद शास्त्र का भी अध्ययन करें तो बात कही तो जाए मगर सलीके से कही जाए जिससे कि उसका असर दोबाला हो जाए.

    • kshipra786 says:

      @siddhanathsingh, जी सर, ये गलती मुझसे हो गई यहाँ | अभी ठीक करती हूँ |
      धन्यवाद सर | सॉरी सर, मुझे काफिये के बारे में थोडा कुछ पता तो है पर लिखना सारा अन्दर से ही आता है |पर मैं कोशिश जरुर करुँगी सर | एक बार फिर से धन्यवाद |

  2. Vishvnand says:

    Rachanaa kaa andaaz alag saa aur bahut badhiyaa lagaa
    rachanaa bhii bahut janchii
    Technique ke baare me anjaan huun
    par rachanaa kaa bhaavrth aur bayaan bahut pyaaraa hai, dil khush kar gayaa.
    Hardik badhaaii

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