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कौन सा मुस्तकिल ये ठिकाना रहा.

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Hindi Poetry
कौन सा मुस्तकिल ये ठिकाना रहा.
रह लिए जब तलक आबो दाना रहा.  मुस्तकिल-स्थायी
 
हो के हमराह अश्कों के सब बह गया
दिल में जज्बों का जो भी खज़ाना रहा.  जज्बों-भावनाओं
 
उस गली में सलामत ज़हन कौन था,
सब  पे वहशत रही,कौन दाना रहा.  सलामत ज़हन-सुरक्षित दिमाग वहशत-पागलपन, दाना-बुद्धिमान 
 
ये जुनूं  कोई कल ही न तारी हुआ,
जब से आँखें मिली दिल दिवाना रहा.   तारी-व्याप्त जुनूं-उन्माद
 
हरकतें हंस के कर या सुबकते हुए,
उस मदारी को सबको नचाना रहा.
 
हंस रहे किस तरह हैं हमीं जानते,
जां निकलती रही,मुस्कुराना रहा.
 
आँख शीरीं जुबां से अलग ही दिखी
उसका लहजा बड़ा जारिहाना रहा.  जारिहाना-आक्रामक शीरीं-मधुर
 
मुन्तजिर रहते रहते उमर कट  गयी,
उनका आना रहा, उनका आना रहा.   मुन्तजिर-प्रतीक्षरत
 
मुड के देखा किसी ने न कल  एक नज़र
जिनके पीछे कभी कुल ज़माना रहा.

6 Comments

  1. Vishvnand says:

    बढ़िया और बहुत खूब

    आये थे जब लगा ये समा स्वर्ग सा
    बड़ा उदास उनका जाना रहा

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