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“परम्परागत पूजा”

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Hindi Poetry
“परम्परागत पूजा”
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मैं पूजा में बैठा, सम्मुख दुर्गा माँ की मूर्ति,
जिसके दर्शन से आती तन-मन में स्फूर्ति !

जगदम्बे की अनुकम्पा से होता है निष्पाप ह्रदय, 
वैदिक मंत्रोच्चार से पूजक हो जाता है निर्भय !
परम्परागत पूजा है हमारी जो मैं करता आया हूँ,
कन्या-पूजन करके उनकी झोली भरता आया हूँ !

बाल्यकाल्य से ही मेरे मन में भरी हुई लगन ऐसी,
नवरात्रि के पावन पर्व में पूजा रही सदा ही हितैषी !
श्रद्धापूर्ण पूजन से अमानवीयता हो जाती नष्ट, 
दृढ़ विश्वास से सुगमतापूर्वक दूर होजाता कष्ट !

सच्चरित्र होजाता है मन ऐसे विधिवत`पूजन से,
भय नहिं रहता मिलने से किसी भी पीड़क दुर्जन से !
नम्र निवेदन है मेरा इस धरा में जन्मे मानवों से,
दुर्गा पूजा करोगे तो नहिं होगी हानि दानवों से !

जय अम्बे माँ, जय जगदम्बे, जय जय जगज्जननी,
ऐसा वर दे भक्तों को कि उनका तन हो नहीं छलनी !   
अपरम्पार है तेरी महिमा, जो है त्रिदेव से अभिन्न,
तेरे कुपित होने से ब्रह्मा-विष्णु-शिव भी होजाते खिन्न !
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8 Comments

  1. sahil says:

    “सच्चरित्र होजाता है मन ऐसे विधिवत`पूजन से,
    भय नहिं रहता मिलने से किसी भी पीड़क दुर्जन से !
    नम्र निवेदन है मेरा इस धरा में जन्मे मानवों से,
    दुर्गा पूजा करोगे तो नहिं होगी हानि दानवों से !”

    “गोस्वामी जी आपकी रचित सुन्दर पंक्तियों को साहिल का सत्-सत् नमन स्वीकार करें.”

  2. Vishvnand says:

    A poem rather different & quite special
    in glory of auspicious Indian Pooja ritual
    Heartening to those believing in rituals
    Liked very much

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