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एक बार और..

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Hindi Poetry

एक तालाब किनारे
एक बगुला अपने बच्चे को समझा रहा था
कि मछली कैसे पकड़ते हैं
छोटा बगुला बार बार ग़लतियाँ करता
कभी अपनी चोंच दायें मारता
कभी बायें
लेकिन मछली पकड़ में ना आती
बड़े बगुले ने उसे सौ दफे करके दिखाया
छोटे बगुले को तब भी समझ में ना आया
बस हर बार कहता, “एक बार और” करके बताओ ना
खेल चलता रहा
बड़ा ‘एक बार और’ करता रहा, छोटा ‘एक बार और’ देखता रहा
और धीरे धीरे छोटा बगुला सब सीख गया
समय निकला
छोटा हुआ बड़ा और बड़ा हो गया बूढा
एक दिन छोटा बगुला घर में कोई नया दाना लेकर आया
और बोला ये नयी चीज़ है खाकर देखो
बड़े को समझ नहीं आया कि कैसे खाए
बोला बेटा एक बार ज़रा खा कर तो दिखा कैसे खाते हैं
जल्दी में तो था ही, छोटे ने झट से खाकर बता दिया
बड़े ने बोला बेटा “एक बार और” बताओ बूढ़ी आँखों को ज़रा दिखाई नही पड़ा
“एक बार में कोई चीज़ समझ आती है तुम्हे?”
ऐसा कह छोटा बगुला बाहर उड़ गया ..

4 Comments

  1. Vishvnand says:

    बहुत बढ़िया वैचारिक और प्रभावी
    ऐसी सुन्दर भावनिक रचना के लिए हार्दिक बधाई

    ये बात बुजुर्गों को एक बार में ही समझ आ गयी
    क्या आज जो जवान है पर बुजुर्ग नहीं उन्हें समझ में आयेगी ? 🙂

  2. nish1603 says:

    सत्य और सुंदर…!!

  3. s.n.singh says:

    purani kahani ko naya roop diya gaya

  4. PRAVEEN GUPTA says:

    पढ़कर अच्छा लगा…..:)

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