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तेरी पलकें झुकीं झुकीं

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Hindi Poetry

तेरी पलकें झुकी झुकी जो उठती है
कोई जादू सा असर हमपे करती है
क्या बताएं तू कैसी लगती है
जान तू जानशीन लगती है
तेरी बातों में न जाने कैसा जादू है
मेरी दिल को तेरी ही आरजू है
तेरी तिरछी झुकी नजरों का समां है
तेरी मदभरी ओठें जाम छलकती है
कोई जादू सा…

तू मिली तो जिन्दगी हसीं हो गई
मेरी साम तेरे साथ रंगीन हो गई
तू है कोई साम-ए-ग़ज़ल
आयें मज़ा माय का पल-पल
दिल में है तेरे चाहत की हलचल
तेरा हसीं चेहरा जैसे खिला कमल
तेरा तन चमन तू खुशबूं बिखरती है
कोई जादू सा…

तेरे लिए मेरा दिल जन हाजिर
तू मेरे ख्वाबों की तामीर
तेरे ख्याल में डूबा मेरा हर लम्हा
तेरे बिना में तो रहा तन्हा
तू जो मेरे रु- ब-रु है तो बाकि क्या गुफ्तगू है
तेरी आँखें सों बातें कह जाती है
कोई जादू सा…

तेरा हर बातों पे मुस्कुराना
तेरी मुझसे नजरे मिलाना
जाने क्यों दिल लुभाता है
मन तेरे ख्वाबों में खो जाता है
तुझसे मिलके आयें दिल को सुकून
हर साम तेरा मै इंतज़ार करूँ
तेरे ख्वाब हमें सारी रात जगाती है
कोई जादू सा…

{I wrote this poem on seeing a girl of my school during 9th standard at Hajipur, Bihar but could not express my unfathomable love to her. The year was 2002 and season was of spring and her charms was unbelievably superb.}

Shashikant Nishant Sharma

2 Comments

  1. Vishvnand says:

    रचना की कल्पना अच्छी है
    पर शब्दों की गल्तियाँ भी बहुत हैं जिन्हें सुधारना जरूरी है .

  2. s.n.singh says:

    साम नहीं शाम, “तेरी मुझसे नज़रें मिलाना” नहीं- तेरा मुझसे नज़रें मिलाना, “तेरी मद भरी ओठें” नहीं- तेरे मद भरे ओंठ होना चाहिए बन्धु, व्याकरण का ध्यान न रखें तो रचना आँखों में खटकती है.

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