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मेहमान कहते है…

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उसके दर पे जो इक दिन, मै भूल से गया,
ठहर न जाऊ ये सोचकर,मेहमान कहते है.
इस शोर मै कुछ बोलू तो सुनता नहीं कोई,
और चुप रहता हु तो मुझे बेजुबान कहते है.
उस पत्थर तो तराशकर मैंने भगवान् बनाया,
मुझे अछूत और पत्थर को भगवान कहते है.
माँ से जहा ममता मिली बीता जहा बचपन,
उस घर को ये लोग अब मकान  कहते है..
खुश होकर जब मैंने अपना नाम बतलाया,
तो होगी कोई दूर की पहचान कहते है……प्रवीण “पंख”

9 Comments

  1. Vishvnand says:

    वाह वाह बहुत खूब
    ऐसे ही शेरों को बड़ा खूबसूरत अंदाज़ कहते हैं

    बहुत मनभावन

  2. kshipra786 says:

    बहुत अच्छा लिखतें है प्रवीणजी |

  3. Siddha Nath Singh says:

    bahut khoob.

  4. Aditya ! says:

    वाह. एक से बढ़कर एक शेर. लिखते रहिये!

  5. Abhishek Khare says:

    Bahut sundar sher hai janab, maza agaya.

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