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ये किस मुक़ाम पे आखिर हयात लायी है.

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ये किस मुक़ाम पे आखिर हयात लायी है.
वो साथ तो है मगर बीच में ख़ुदाई है. 
 
नहीं फ़राग कि नज़रें उठा के देखें भी,
औ’ दावा ये कि मुहब्बत तो इन्तिहाई है.
 
जो बन चुके थे कभी हिस्साए वजूद मेरा,
उन्हें भी काट गया वक़्त का क़साई है.
 
मतालबात हमीं से रखे गए हरदम,
कुछ अपने आप से रखने में क्या बुराई है.
 
शहर में कुछ भी न हासिल है आहो जारी से,
ये अश्क पी लो यही दर्द की दवाई है.
 
किसी का देख के चेहरा तुम आये याद बहुत,
निचाट रेत में औचक बहार आई है.
 

6 Comments

  1. Vishvnand says:

    बहुत खूब
    बड़े खूबसूरत शेर

    “ये किस मुक़ाम पे आखिर हयात लायी है.
    वो साथ तो है मगर बीच में ख़ुदाई है.”

    उसकी मर्जी आये हम, उसकी मर्जी जब जायेंगे
    शेरो शायरी उसका वरदान बहुत बड़ी दुहाई है

  2. Narayan Singh Chouhan says:

    बेहतरीन सिंह साहब

  3. U.M.Sahai says:

    नहीं फ़राग कि नज़रें उठा के देखें भी,
    औ’ दावा ये कि मुहब्बत तो इन्तिहाई है
    मुझे तो ये शेर बहुत अच्छा लगा.

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