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रात भर

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Anthology 2013 Entries, Hindi Poetry
 
 
सपनो के रथ पर होकर सवार
उड़ रही थी मै बादलों के पार
 
 
 
सामने खड़ा जो तुम्हे पाया
शर्माये, झट खुले नैनों के द्वार
 
 
 
आँखें फैला फैला के देखा
चहुँ ओर था चांदनी का प्रसार
 
 
 
फिर सपनों के रथ पर चढ़ी ढूंढ़ती
खोजती थी कहाँ छुपा है मेरा प्यार
 
 
 
देखा तो मुस्कुराते खड़े तुम
भर लिया अंक में बाहें पसार
 
 
 
झील में खिल गए मन के कमल
मिलन की प्रबल भावना हुई साकार
 
 
 
बिंदु का सिन्धु में हो रहा विलय
तन मन दोनों हुए एकाकार
 
 
 
बादलों ने तान लीनी झीनी चदरिया
तारें झिलमिलाये रात भर इस प्रकार
 
 
 
ख़्वाबों ही ख़्वाबों में ढल गई रात
न जाने कब हुआ सुबह का उजार
संतोष भाऊवाला

4 Comments

  1. kshipra786 says:

    is sundar rachna ke liye
    saadar savinay aabhar |

  2. rajendra sharma "vivek" says:

    Bahut sundar bhaavanaaye sundar hai shilp achhi rachanaa ke liye badhaai

  3. Vishvnand says:

    ati sundar aur prashansaneey
    bahut man bhaayii ye aapkii rachanaa
    hardik badhaaii

  4. santosh bhauwala says:

    Aadarniy ,kshipra ji ,rajendra sharma ji ,vishvnand ji ,aap sabhi ka aashish mila kritagya hui ,ati shay dhanywaad !
    santosh bhauwala

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