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जब जरुरत हो मुझे

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Anthology 2013 Entries, Hindi Poetry

हर सर्जन की कल्पना,

 उसके पोषण का आधार ,

सबकी धूरी मैं ही हूँ ,और

इन सबका केंद्र …………प्यार

मेरा ही दूसरा नाम है ,

मुझे मेरी ही जरुरत नहीं ,

हो सके तो प्यारा साथ बनकर आना तुम

जब जरुरत हो मुझे ॥

वो मैं ही हूँ ,

जो टूटकर भी तुम्हे मेघ बना उठती हूँ ,

और तुम्हारी दया बन ,फिर से बिखर जाती हूँ ,

कष्ट नहीं है इसमें मुझे लेश भी ,

बस जब भी कुछ२ बोझिल सा लगने लगे,

सर्द हवा बन बह जाना तुम ,

जब जरुरत हो मुझे ॥

मैं ही तुम्हारे निर्माण को अतल गहराइयों में रहती हूँ ,

और हर उद्वेलन को तुहारी मंजिल समझ,

धरा पे बहती हूँ,

बिछुड़कर तुमसे जीना  तो है मुश्किल,

बस मरकर भी अमर हो जाऊं,

सो मुझमें मोती सा जम जाना तुम,

जब जरुरत हो मुझे॥

मैं ही समस्त वनस्पति का मूल हूँ,

भौतिक लावण्य का शब्द अनुकूल हूँ ,

जीवन क्षणभंगुर है मेरा ,

पर अनंत में खो जाने से पहले ,

किसी चिर सम्रति में बस  जाऊं,

सो मुझसे सुवास बन उड़ जाना तुम,

 जब जरुरत हो मुझे ॥

मैं ही हर गीत का आगाज हूँ,

मैं ही हर शब्द की परवाज हूँ,

अनंत, अमित अस्तित्व और

सात रंग समाकर भी, कुछ अधुरापन सा है ,

इसीलिए जब भी ह्रदय से उठकर ,

होठो तक आना चाहूँ ,

तो कंठ बन गाना तुम,

जब जरुरत हो मुझे ॥

 

मैं ही ईश्वरी कृति के अधूरेपन का विकल्प हूँ ,

मैं ही छठी इंद्री के रूप में आभासों का संकल्प हूँ,

चूकना मेरी गलती है ,या

                          नियति, नहीं जानती ,

पर अग्रिम कष्टों को जानकार भी ,

निषेध फल खान तुम ,

 जब जरुरत हो मुझे ॥

 

मैं ही चर-अचर का अभिमान हूँ ,

स्वयं विधाता का एकमात्र जन्म स्थान हूँ ,

अपार हिम हो ,

                या गहरा ताप ,

पी जाउंगी सब मेरु आघात ,

पर जब २ रवि का क्रोध अधिकाए ,

आकाश बन छ जाना तुम, 

जब जरुरत हो मुझे ॥

 

मैं ही सवेद्नाओँ का ज्वार हूँ ,

दुखी असंतप्त मन का आभार हूँ ,

निषेधित प्रसन्नता हो या ,

                            जाना बुझा क्लेश ,

सब कुछ स्वीकार्य है मुझे ,

हर स्थिति में गहराऊँगी ,

बस अधर बन खिल जाना तुम ,

जब जरुरत हो मुझे ॥

 

मैं ही डगमगाते क़दमों पर

        पूर्ण विराम लगाती हूँ ,

अधमुंदी तुम्हारी पलकों को

                       सिरहाना दे जाती हूँ ,

सौम्य,शांत मेरे मन को

आहाट  भी डराती है,

तो भी ना वक़्त से पहले तुम्हे जगाऊँगी ,

पर जब कुछ २  थकने लगे  मेरा भी तन 

उजला दिन बन विश्राम दे जाना  तुम,

जब जरुरत हो मुझे ||

 

मैं ही हर्फों को उभारती हूँ ,

मैं ही अहसासों को सवांरती हूँ ,

समझती हूँ मन के हर एक रंग का अर्थ,

फिर भी तुलिका बनने  में हूँ असमर्थ ,

सो जब भी उकारना चाहूँ

         किसी जर्द स्याह पन्ने पर

कलम बन गड जाना तुम ,

जब जरुरत हो मुझे ।।

 

9 Comments

  1. s n singh says:

    4 layino se 78 layino tak ka safar ! nayi style aur naya pravah.

  2. anjaana says:

    Lovely creation with intense meaning

    • kshipra786 says:

      thankyou sir, specially to read in such way that could understand the hidden meaning.

      • anjaana says:

        Your creations have very intense meanings and I like them a lot. Keep writing as poems give us way to express our love and feelings.

        • kshipra786 says:

          bas yahi,love or feeligs hai to poetry hogi or poetry hai to love or feeligs bhi hogi.thanks again.i will do my best.

  3. Rahul Sharma says:

    udbhutt rachna h. Nari aur Nar ke rishtey ki udbhutt pyar bhari rachna. People say women are unpredictable, just try to understand them, they are lovable. A poem with love and dedication. Cheers

    • kshipra786 says:

      dil se shukriya, really a woman only and only need a bit understanding, if one can do so, definitely find an open book.

  4. Rahul Sharma says:

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