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” जल-थल “

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Hindi Poetry

” जल-थल “

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उज्ज्वल-शीतल सलिल सुशांत,
जिससे भरे पड़े सागर जैसे है प्रशांत।
हिन्द महासागर, बंगाल कि खाड़ी में है ऐसा ही,
नील गगन में छटा घटा की छायी हो वैसा ही।
सूर्यताप से नित्य ये जल कुछ भाप बनके कम होता,
नदियों, नालों, झरनों, से जिसका पुनर्भरण होता।।
कूप, कुण्ड, निर्झर अरु, नाले
कभी बंद नहिं होने वाले
ये सारे ही मिल-जुल कर खेतों को हरा भरा रखते।
जिसके फलों-अनाजों को हम खाते-पीते चखते।।
पंचतत्व से बना देह, इनसे ही चलती आयु,
इनकी पूर्णता रहने से हो सकता देह शतायु।
अपने नित्यकर्म को नियमित रखो रहो सदा ही स्वस्थ,
कोई कठिनाई कभी न होगी हो जाओ जब अभ्यस्त।
दीर्धायु का राज़ यही है, यही है जीवन तंत,
जिससे तन में सदा रहेगा आया हुआ बसंत।।
बचपन में तो पनपता है माँ का प्यार-दुलार,
आगे का जीवन फलदायी करता है शाकाहार।
अच्छा खानपान रखता है मन को सदा प्रसन्न,
खानदान बन जाता जिससे अधिकाधिक संपन्न।।
मोटे तौर पे इस पृथ्वी में
थल से लगभग ५ गुना जल है,
जिससे ही हरियाली है
जिसका सुखदायी फल है।।
अश्विनी कुमार गोस्वामी
३-१-१४.
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