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“आग विरह की” virah- for contest

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Hindi Poetry

“विरह” एक ऐसा शब्द है कि इसे बोलने से ही इसकी गहराई का अन्दाजा लग जाता है,
इसका दर्द वो ही जान सकता है जिसका कोई अपना उससे जुदा हो, मैंने भी विरह अपने विचार यहां लिखे हैं, मेरी ये कविता “October contest Virah/Separation” के लिये है,

विरह तो विरह है, ये तो एक आग है,
हो बारिश तो भी जलने लगता है दिल,
ऑखें हो जाती सूनी-सूनी विरहिनी की,
रातें देतीं अह्सास जैसे उजाला दिन की,
विरह एक नहीं जो हो सिर्फ आशिकों का,
ये तो है प्यार आपस में सारे जहां का,
मां-बेटे का, पति-पत्नी का, दोस्तों का,
हो दो दीवानों का, चाहे दो परवानों का,
पिया-मिलन है एक प्यारा सतरंगी अहसास्
पिया से विरह की तड्प एक विरहिनी ही जाने,
वो नारी है सौभाग्यशाली जो बनती है मां,
बच्चों के विरह का गम एक बांझ ही जाने,
कहते हैं गुलामी से बढकर गम नहीं कोई पर,
आजादी के विरह का गम एक गुलाम ही जाने,
माथे पर सुहाग का टीका है पहचान सुहागन की,
भरी-मांग के विरह की तड्प एक विधवा ही जाने,
राखी का पर्व है होता सबसे न्यारा जहां में,
लेकिन बहिन का विरह सूनी कलाई ही जाने,
विरह की आग है ऐसी कि जला दे दिल को,
पर जाने वो जो अपने से तरसे मिलने को,
बस विरह की तपिश ना हो किसी को,
बस मिलन ही मिलन हो हर किसी को.

“अहिल्या”

18 Comments

  1. kalawati says:

    virah ke baare me mere vichar prastut han

  2. parikshit says:

    a good poem with nice ending

  3. renu rakheja says:

    अच्छा प्रयास है

  4. parminder says:

    Nice. Pain of separation in so many different kind of relations can be so unbearable.

  5. medhini says:

    A good poem on separation
    of different kinds.

  6. singh says:

    nice poem on sepration

  7. mona says:

    very nice poem

  8. abhi says:

    good poem wah

  9. simran says:

    भरी-मांग के विरह की तड्प एक विधवा ही जाने,
    राखी का पर्व है होता सबसे न्यारा जहां में,
    लेकिन बहिन का विरह सूनी कलाई ही जाने,
    विरह की आग है ऐसी कि जला दे दिल को,
    wah

  10. kalawati says:

    आप सब को कविता पसन्द आयी, आपका धन्यवाद

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