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“वाह री बचपन की यादें”

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Hindi Poetry

आज का कंपीटीशन का माहौल देखकर बच्चों पर दया आती है, उनका बचपन ना जाने कहां खो गया है, पर क्या करें, इस जमाने के साथ तो चलना ही होगा.

वाह री बचपन की यादें,
वो रो-रो कर अपनी बातें मनवाना,
और अब उसी जिद पर अपने बच्चों को डराना,
वाह री बचपन की यादें,
वो रुठकर किसी कमरे में छिप जाना,
और अब अपने बेटे को आदर्श दिखाना,
वाह री बचपन की यादें,
वो स्कूल ना जाने का बहाना बनाना,
और अब बच्चों को उसी बहाने पर चांटा दिखाना,
वाह री बचपन की यादें,
वो काम ना करने के डर से पापा के पीछे छिप जाना,
और अब बेटी को उसी डर के लिये ससुराल याद कराना,
वाह री बचपन की यादें,
वो मीठा खाने को आधी रात को मचल जाना,
और अब बच्चों को दांतों के कीटाणु दिखाना,
वाह री बचपन की यादें,
वो खेत में जाकर पेड पर चढ जाना,
और अब बच्चों को पलस्तर का डर दिखाना,
वाह री बचपन की यादें,
वो पढने का मन ना होने पर मुंह बनाना,
और अब बच्चों को उनसे साथी के आगे निकल जाने से,
उनके हारने की मन में हर वक्त तस्वीर बनाना,
वाह री बचपन की यादें,
काश आज भी हम दे पाते अपने बच्चों को ,
वो प्यारा-न्यारा हमारा सा बचपन,
पर ये “जिद करो दुनिया बदलो” का नारा,
जिसमें खो गया है बच्चों का बचपन प्यारा,
चलो क्या करें, जैसी बीमारी होती वैसी दवा,
नये जमाने की है बस ऐसी ही बस हवा,
वाह री बचपन की यादें,
वाह री बचपन की यादें,

“अहिल्या”

6 Comments

  1. VishVnand says:

    कलावती जी, बहुत अच्छी और मीठी सी कविता,
    पर सोच में डाल देनेवाली.

    क्या,”ज़माना ही ऐसा है” कहकर, बड़ों का बच्चो से ऐसा पेश आना जरूरी और मजबूरी है ? क्या ये और भी ग़लत नहीं है ?
    इसका अलग विचार और पर्याय नहीं हो सकता ?.

    • kalawati says:

      thanx 4 comment, बिल्कुल सही कहा सर आपने, पर क्या करें इसे ही मजबूरी कहा गया है, कि कुछ करना चाहे तो भी कर नहीं पाते.

  2. sushil sarna says:

    चलो क्या करें, जैसी बीमारी होती वैसी दवा,
    नये जमाने की है बस ऐसी ही बस हवा,
    klawati ji, in linon main hmain haar kee tsveer nzr aa rhee hai. bchpan kl bhee bchpan tha aaj bhee bachpan hai jis trh 24 hrs ke 25 hrs naheen ho skte usee trh hm bachpn ko smye ka bhaana bna kr smye kee bhent nheen chra skte.hmain seemit samey main hee hr bachpan ko sajana hoga naheen to koee bhee bachpan kl yeh naheen khega”bachpen ke din bhee kya din the” any how no doubt it is good poem.

  3. vartika says:

    safal samaaj ki tasveer aur safalta k paimaane par ek prashn-chihn kheenchti ye rachnaa…

    badhai

  4. rajdeep bhattacharya says:

    Nicely execution of your feelings and thoughts
    very nice
    regards
    deep

  5. sonal says:

    Very nice poem.

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