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“रिश्तों की रस्सा-कस्सी “

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Hindi Poetry

सदियों से ये एक खेल चला आ रहा है,
रस्सा -कस्सी तबसे सबको लुभा रहा है ,
जिसमे होती है दो टीमों में खींचा – तानी,
इसमे हो भी जाती लडाई उनमे जुबानी ,
और आज ये ही खेल रिशतों में हो रहा है,
तीन दिन बाद वैलेंटाइन -डे आ रहा है,
बेटे ने समझाया कि जिसको भी करो प्यार,
वो ही होता आपका वैलेंटाइन लाता बहार ,
तो माँ मेरी वैलेंटाइन तो बस आप हँ,
करता हूँ बस मै आपसे ही प्यार बेशुमार,
आपका है मेरी हर चीज़ पर अधिकार,
सुन कर इतना दिल में बज उठी झंकार,
अपनी ही नज़र उतारने को दिल था बेकरार,
एक झटके में याद आया कल का दिन,
पति देव जी ने हिम्मत करके था पुकारा,
अरे कहाँ हो हमारे दिल की वैलेंटाइन ,
समझ गई मै कि जरूर गाँव से है समाचार,
तभी तो हम पर प्यार लुटा रहे हँ सरकार,
वे बोले माँ-बाबा ने गाँव में बुलाया है,
तुम दो आदेश तो हम साथ चलते हँ,
भन्ना उठी मै, गुस्से में , आक्रोश में,
क्या कह रहे हो? , हो तुम होश में,
हमारे अपने भी तो कुछ सपने हँ,
या कह दो वो ही तुम्हारे अपने हँ,
पर आज तो दिल ने मुझे धिक्कारा था,
मेरी अपनी सफाई का रहा कहाँ चारा था,
अनायास मेरे हाथ फ़ोन पर जा रहे थे,
और वो तो गाँव की घंटी बजा रहे थे,
मेरे कानों को मेरी ही आवाज़ आ रही थी,
जो माँ-बाबा को गाँव आने की सुना रही थी.

“अहिल्या”

8 Comments

  1. Ravi k Rajbhar says:

    Bahut sunder…tarife kabil

  2. Seema says:

    Very nice Kalawati ji…A beautiful introspection and very well expressed… sone pe suhaga!!
    Loved the line ” तो माँ मेरी वैलेंटाइन तो बस आप हँ”

  3. HIRAL SONI says:

    relly nice……

  4. Vishvnand says:

    कलावती जी, कविता बहुत अच्छी लगी |

    कविता पढ़ने का,
    बहुत मजा आया,
    मन भर आया,
    कितनी कितनी बातों का,
    भूला ख्याल आता रहा ….!.

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