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बड़े हो रहे हैं

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बड़े हो रहे हैं

यही फासले तो
बड़े हो रहे हैं

जहाँ थे संमुदर ,
वहीं बस्तियाँ थी
बड़ी चाहतें थी,
खड़ी कश्तियाँ थी
हवाओं के रूख फिर
कड़े हो रहे हैं।
यही फाँसले तो
बड़े हो रहे हैं।

ये नदियाँ किनारे
वो पर्वत ..ऊँचाई
रही पास आती
अधिक नीची खाई
उजड़ते थे वन
थरथरा हम रहे थे

फिजाओं के रूख फिर
कड़े हो रहें हैं
यही फासले तो
बड़े हो रहे हैं।
कमलेश कुमार दीवान
२०अप्रेल २००५

2 Comments

  1. Vishvnand says:

    बहुत सुन्दर और मनभावनी रचना,
    बधाई है

  2. dr.paliwal says:

    Bahut Khoobsurat,pyarisi rachna…..
    Padhkar Achchha Laga…..

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