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मुड़ कर न देखना

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Hindi Poetry
वक़्त के इशारे पे,

 

नदी के इस किनारे से,

 

रुख़सत तो पड़ रहा है तुम्हे करना

 

बस इतनी सी गुज़ारिश है मेरे दोस्त

 

इस तरफ़ मुड़ कर न देखना
जाते हुए क़दमों की आहट को मैं सुन लूँगा

 

चुप चाप शायद रो भी लूँ,

 

पर कुछ न कहूँगा

 

पर अपनी आंखों में आए तूफ़ान से,

 

मेरे सब्र के बाँध की ताक़त को न परखना

 

बस इसीलिए गुज़ारिश है मेरे दोस्त

 

अब कभी मुड़ कर न देखना

3 Comments

  1. Vishvnand says:

    बहुत अच्छी रचना,
    मुड मुड कर देखने और पढ़कर सराहने के काबिल
    बधाई

  2. dr.paliwal says:

    BAHUT SUNDAR, BADI MANBHAVAN SI RACHNA…….

  3. vartika says:

    “पर अपनी आंखों में आए तूफ़ान से,
    मेरे सब्र के बाँध की ताक़त को न परखना”

    behad khoobsoorti si piroye gaye ehsaas hain…. dard ko bahtu sehajtaa se sametaa hai aapne shabdon mein…. sunder rachnaa…

    agrim rachnaon ki prateeksha rahegi… 🙂

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