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दफ्तर विचित्र देश है दफ्तर विचित्र व्यापार है.

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Hindi Poetry
दफ्तर !
हाँ बाबू  ये दफ्तर है.
यहाँ- 
समय एक विलासिता है 
और काम का पहिया वर्गाकार!
चलता तो है,
 मगर, 
धचके के साथ और
वो भी बड़ी मशक्कत के बाद.
यहाँ छोटी बड़ी और बहुत बड़ी टेबुलें हैं ,
जो नापती रहती हैं 
आदमी का कद और क़द्रें,
टेबुलों पर कागज़ हैं- झक्क सफ़ेद .
किन्तु
हर सफ़ेद कागज़ के नीचे एक काला कार्बन  है .
और हर कार्बन तले एक सफ़ेद कागज़
ट्रू कोपी रखने के लिए !
सब कागज़ एकत्र होते हैं और यह भीड़
एक फाइल में तब्दील हो जाती है,
फाइल यानी पत्रावली!
कागजों के आवागमन का बाँझ इतिहास!
हर फाइल में है नोट शीट!
जिस पर बिछती हैं
दिमागी कसरतें उँगलियों के इंगित पर
नोट शीट,
जहाँ मूल लेख से ज्यादा महत्वपूर्ण है हाशिया,
हाशिये पर हुई नोटिंग!
हर एक नोटिंग में निहित  है
एक आदमी .
और हर आदमी की फाइल में हैं हाशिये,
हाशियों में नोटिंग
जो वहां दर्ज होने में हज़ार मनुहार मांगती है
आदमी से.
आदमी
जो सो सोचता  है कि वह अगर न बैठा कल
कुर्सी पर,
तो रुक जाएगी फाइलों की गर्दिश ,
श्रृष्टि की गति और
काम की रफ्ता रफ्ता रफ़्तार
मगर
जब आदमी टायर  हुए बगैर ही रिटायर
किंवा स्थानातरित हो
 जाता हैं
तो पाता है कि
काम
 तो चालू है ज्यों का त्यों,
वर्गाकार पहिया खींच रहा है गाड़ी
धचकों के साथ वैसे ही.
तब,
बोधिवृक्ष के तले बैठे बगैर  ही
होता है बोध ,
कि,
दफ्तर तो कुर्सियां चलाती हैं
आदमी महज़ औजार है
दफ्तर विचित्र देश है
दफ्तर विचित्र व्यापार है.

2 Comments

  1. c k goswami says:

    बहुत ही बढ़िया तरीके से सरकारी कार्यालय का लेखा जोखा प्रस्तुत करने में कवि कामयाब हुवा है.भाषा भी आम बोलचाल और समझ में आनेवाली है .

  2. medhini says:

    Bahut khubsoorat kavitha hai!, Siddanath.

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