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ये जरूरी तो नहीं…

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Crowned Poem, Hindi Poetry

हाथ को हाथ गर सूझता नहीं
हाथ गरेबान तक पहुंचे, ये जरूरी तो नहीं

मुसाफिर ही तो था, राह भटक गया था
भटक कर तेरे दर तक पहुंचे, ये जरूरी तो नहीं

माना कि उससे कोई मरासिम न थे
उससे तकरार भी हो, ये जरूरी तो नहीं

कल शब् शहर की गलियों में बड़ी रौशनी रही
सितारा कोई फ़लक से टूटा हो, ये जरूरी तो नहीं

एक रोज़ मैं भी सीधा खड़ा हो जाऊँगा
ताउम्र सजदे में रहूँ, ये जरूरी तो नहीं

वक़्त-बे-वक़्त मेरी बेचैनी बढ़ जाती है
तेरी याद ही आयी हो, ये जरूरी तो नहीं

माना कि बेवफाई की पहचान थी नामुमकिन
ये इलज़ाम मुझ पर लगे, ये जरूरी तो नहीं.

8 Comments

  1. Vishvnand says:

    खूबसूरत और बेहतरीन
    रचना बहुत मन भायी,
    बस पढ़ें , चुप रहें, कुछ न कहें,
    ये जरूरी तो नहीं …..
    इस सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई ….

  2. rajshree rajbhar says:

    wah bahut khub bahut hi sunder kavita

  3. prachi says:

    veryyy touching 1 sir….awesome

  4. sushil sarna says:

    वक़्त-बे-वक़्त मेरी बेचैनी बढ़ जाती है
    तेरी याद ही आयी हो, ये जरूरी तो नहीं

    बहुत लाजवाब पंक्तियाँ, बेहतरीन रचना- बधाई

  5. parminder says:

    अति सुंदर ! हर तारीफ़ को शब्दों में पिरोया जा सके, यह ज़रूरी तो नहीं!

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