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नारी: कौन है तू?

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Hindi Poetry

भगवान ने जब सृष्टी बसाई
पुरुष और नारी की ज़िम्मेदारी बढाई
मानवता की रक्षा करने हेतु
नारी की ही भूमिका जताई!

पंचतत्व का करना सम्मान
जो तेरे अन्दर है रची बसी
जल सी पवित्र और निश्छल बन
जननी और पालनहार जैसी तू मही!

बन के रौशनी आग की तू
दिखलाती जा राह नयी
भर के आसमानी रंगों की परछाई
सपनें सजाती जा वही!

लिए समानता हवा की
तू, बढती जाना उस ओर
देख, टूटने ना पाए
संजोये सपने और आस की पतली डोर!

त्याग की मूर्ति
आवेग की पूर्ति
नारी, तुम ही करती!

तेरा मन इतना निर्मल
जितना विशाल उतना ही सुकोमल
देख तेरे कितने है रूप
पल में पर्वत की जैसे तू अटल
अगले ही पल फूलों सी शिथिल!

प्रेम और करुणा के सागर
बहाए तेरे नीर गागर
अल्हड, मदमस्त पवन के झोके
सब ठहरे तेरी ही आँखों में आ कर!

नारी, तेरे विभिनन रूप और रंग
ले जा सब संग!

9 Comments

  1. Santosh says:

    Hi Rachana,

    Very nice poem..

    keep it up..

    Regards,
    Santosh

  2. Vishvnand says:

    नारी ने नारी पर रची इतनी सुन्दर रचना,
    क्या बात है रचना, बहुत गुणी हैं दोनों रचना
    तुम्हे बधाई और अभिवादन की उभरीं मन से भावना ….

    • Rachana says:

      @Vishvnand,

      आपके शब्द मेरी प्रेरणा के आधार है! मेरी रचना पसंद करने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद!

      रचना

  3. dr.paliwal says:

    अच्छी रचना है…..
    विधाता की अदभुत रचना(नारी), पर रचना की यह रचना बहुत सुन्दर है……

  4. rachana says:

    उत्साहवर्धन के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया!

    रचना

  5. parminder says:

    नारी पर एक अति श्रेष्ठ रचना ! पढ़कर सर और ऊंचा हो गया |

  6. Ashok Jaiswal says:

    बहुत ही बढ़िया……………………

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