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जो हाथ न आया हाथ मेरे , बस उसके लिए तड़पना था.

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Hindi Poetry

जो टूट गया वह सपना था.

जो हाथ लगा वह अपना था.!1!

जो हाथ न आया हाथ मेरे

बस उसके लिए तड़पना था. !2!

कच्ची थी मिट्टी बिखर गयी

कुछ और अभी तो तपना था.!3!

मज़बूरी थी करते भी क्या

मतलब के मंतर जपना था ! 4!

थे हाथ मेरे हल्दी वाले

कुछ दीवारों पर छपना था !5!.

जब पूछा उसने हाल मेरा

आवाज तुझे भी कँपना था !6!.

6 Comments

  1. prachi says:

    beautiful poem sir… 🙂

  2. siddhanathsingh says:

    आशा है आगे भी मेरी रचनाओं का आस्वादन करती रहेंगी.

  3. Raj says:

    वाह. बहुत ही सुन्दर लय और शब्द.
    “कच्ची थी मिट्टी बिखर गयी, कुछ और अभी तो तपना था.
    जब पूछा उसने हाल मेरा, आवाज तुझे भी कँपना था”
    — सिद्ध नाथ जी, कमाल किया है आपकी कलम ने.

    • siddha nath singh says:

      @Raj, Thanks.आप को ahladit किया मेरी रचना ने मुझे बेहद ख़ुशी हुई.

  4. Vishvnand says:

    बहुत खूब, दिलखुश रचना, बधाई
    पढ़कर कुछ ऐसा लगा मुझे,
    मुझको भी ऐसा लिखना था …

    • siddha nath singh says:

      @Vishvnand, ये रचना प्राची जी की एक कविता की प्रतिक्रिया स्वरूप प्रकट हुई थी.आप को अच्छी लगी मेरा धन्यवाद स्वीकार करें.

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