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जिसपे रो लें ,कोई शाना ही नहीं

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Hindi Poetry

ये  फ़साना  बस  फ़साना ही नहीं !

सच मगर तुमने ये जाना ही नहीं !

आ सका शायद हमें अच्छी तरह

दास्ताने दिल सुनाना ही नहीं !

शामे फ़ुरक़त गम की लज्ज़त क्या मिले,   ( furqat-viyog)

जिसपे रो लें ,कोई शाना ही नहीं !       (shanah-kandha)

तुमने भी जज़्बात कब समझे मेरे,

मुझपे हँसता था ज़माना ही नहीं !

रोज़ दुनिया दर्द देती है  नए ,

दर्द एक तेरा पुराना ही नहीं !

जिससे उजड़ेंगे कई सहने चमन,   (  sahne chaman-upvan prangan)

उन गुलों से घर सजाना ही नहीं !    (gul-phool)

ज़िन्दगी का है कोई मकसद ज़रूर,

ज़िन्दगी बस आना जाना ही नहीं !

गर्दिशों में आज तक मसरूफ हैं,   (gardish-chkraman,parikrama)

चाँद तारों का ठिकाना ही नहीं !

पर्दादारी इस क़दर हमसे तुम्हे,    (pardadari— durav-chipav)

तुमने हमको अपना माना ही नहीं !

और कब तक रहते मिस्ले अजनबी,    (misle ajnabi-ajnabi ki tarah)

जिस  शहर में आबो दाना ही नहीं !    (aabo dana-aashraya)

कुल चमन हिर्सो हसद में फुंक रहा,    (hirso-hasad- lalach aur irshya)

जल रहा एक आशियाना ही नहीं !

4 Comments

  1. U.M.Sahai says:

    अच्छी ग़ज़ल, एस.एन. बधाई खास तौर पर ये लाइने
    जिससे उजड़ेंगे कई सहने चमन,
    उन गुलों से घर सजाना ही नहीं !

  2. parminder says:

    सुन्दर रचना| शब्दों का बहुत सुन्दर प्रयोग है|

    • siddha Nath Singh says:

      @parminder, परमिंदर जी, रचना पसंद कर टिप्पणी करने के लिए शुक्रिया.

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