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जीवन

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मेरे पास आओ ,
फिर बताऊ जीवन क्या है ….
यह नहीं है ,
सिर्फ यौवन के तरंगो की धडकन
खुशियों की चांदनी का अनुकम्पन
या कि ..
क्लबो की ब्यस्त थिरकन
अतृप्त जीवन की भटकन.
वंहा तुम खुद को खोकर भी पा न सकोगे
उदासी से भाग न सकोगे ..
तुम मानव हो मशीन नहीं
दिल भी है तुम्हारे पास
तुम भावना विहीन नहीं
उमर के उस पड़ाव से पीछे देखोगे
तो दिखेगी पाश्चात्य की केंचुली में लिपटी सारी जिंदगी !
एक तमाशा बन के रह जाएगी ,
स्वतंत्रता की खोज में पूरा जीवन भटका है .
तुझे कुछ भी नहीं मिला है
विचारो से किताबे लिखी जाती हैं
जिंदगी नहीं चलती
कंहा तक भागोगे खुद से
अपनी आत्मा की आवाज से
यह दुहारापन कंही का नहीं रखेगा
सिर्फ ठगेगा
आधुनिकता की आंधी में
पराधीन मन उड़ता ही रहेगा
आखिर में सोचोगे तो पाओगे
कुछ नहीं बचा तुम्हारे पास …
न मन ,न बचन ,न जीवन …
सब कुछ परवश हो गए हैं …
एकदम अलग विचारो के !
रह गयी है सिर्फ केंचुली अपने पास
छुटी हुई ,निः सारता प्रदर्शित करती हुई ,!
विजय

10 Comments

  1. Vishvnand says:

    बहुत सुन्दर कविता.
    उपयुक्त उत्तम कथन
    सरल प्रभावी और बहुत अर्थपूर्ण.
    रचना के लिए हार्दिक बधाई

  2. prachi says:

    a deep one,,like it 🙂

  3. vmjain says:

    बहुत गहन भावों से जुडी और विचारों को झकझोरती कविता. मन आनंदित हुआ.

  4. parminder says:

    गूढ़ विचारों से भरी सुन्दर रचना| बहुत मन भाई|

  5. ramesh says:

    ati uttam Sir jee. bhava pravdata apane uttarkarsh par hai is kavita me. aap isi tharah acchi acchi kavitae dete rahe. rachana ke liye badhai.
    ye laine bahut acchi lagi-
    आखिर में सोचोगे तो पाओगे
    कुछ नहीं बचा तुम्हारे पास …
    न मन ,न बचन ,न जीवन …
    mo ko awashya padhana chahie.

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