« »

तन्हा की डायरी

0 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 5
Loading...
Hindi Poetry

किसी अकेले या तन्हा को शब्दों से नफरत होती है
ये बात कोई नहीं जानता
मेरे लिए भी ये बात राज़ ही रहती
जो मुझे एक रोज तन्हाई में पड़ी किसी तन्हा की तन्हा सी
वो डायरी न मिलती
अजीब भाषा में लिखी गयी थी वो डायरी
एक भी शब्द मैं न पहचान पाया
फिर समझा की ये शब्द है ही नहीं
तन्हा को शब्दों से क्या वास्ता
यूँ तो तन्हा भी एक शब्द होता है
पर जो तन्हा हो वो निशब्द होता है

कुछ बेढंगे से चेहरे बने थे अन्दर के कुछ पन्नों पर
कुछ के चेहरे नहीं थे तो किसी का
सर नहीं था कंधों पर
न जाने कब से तन्हा था
चेहरे कैसे होते हैं ये भी भूल गया था
ये देख मैं सहम गया

डायरी पर  उसका नाम न दिखा कहीं
पर रूह सहम गयी जब ये समझा के
उसने नाम क्यों  नहीं लिखा
क्या लिखता उस नाम को जिसे किसी ने बुलाया नहीं

कभी मिलो किसी तन्हा से
तो इतना काम जरूर कर देना
बहुत पास न जाना बेशक और
चाहे कोई बात न करना
दूर से ही उसे “तन्हा” कह देना
याद करने करने को चेहरा
और लिखने को एक नाम
दे देना

4 Comments

  1. U.M.Sahai says:

    सुंदर रचना, बधाई

  2. siddhanathsingh says:

    वाह क्या बात है.तनहा को संज्ञाशून्य बना दिया आप ने, मगर ऐसा होता है क्या?
    किसी शायर ने कहा है-
    मेरे सुकूत से मुझे बेहिस न जानिये, (सुकूत-ख़ामोशी, बेहिस-संज्ञा शून्य )
    अलफ़ाज़ की कमी है,ख़यालात की नहीं !

  3. prachi says:

    good one 🙂

Leave a Reply