« »

दुनिया की खोज -स्वयं की खोज

2 votes, average: 4.50 out of 52 votes, average: 4.50 out of 52 votes, average: 4.50 out of 52 votes, average: 4.50 out of 52 votes, average: 4.50 out of 5
Loading...
Hindi Poetry

भूतकाल को भूल चुका मैं
वर्तमान से लड़ता हूँ
है भविष्य की चिंता मुझको
निजहित हेतु झगड़ता हूँ
खोज लिया है खुद को मैंने
ऐसे  ही अब जीना है
खुदगर्जों की इस नगरी में
लहू सभी का पीना है
चारों ओर है आपाधापी
मतलब की सब यारी है
बनू स्वार्थी   दुनिया में रह
अब   मेरी  भी  बारी है
परोपकार में क्या पाया है
जग से बुरा बना हूँ मैं
जिनका भला किया वो भूले
हुवा अजनबी उनसे  मैं
खुद को अब पहचाना मैंने
जग   सांचे में ढाल रहा हूँ
कीड़े खुदगर्जी मक्कारी संग
बे-इमानी के  पाल रहा हूँ
करेंगे कीड़े बदन में किलबिल
तब ये पाठ पढ़ाएंगे
कैसे जीया जाता जग में
जीना मुझे   सिखायेंगे
———सी के गोस्वामी (चन्द्र कान्त)जयपुर.

20 Comments

  1. Vishvnand says:

    बहुत सुन्दर मनभावन रचना और अर्थपूर्ण कटाक्ष .
    रचना के लिए हार्दिक प्रशंसा
    ये रचना पढ़कर मेरे जो भाव उभरे उन्हें लिख रहा हूँ …
    खुद की खोज में लगा रहा
    पर समझ न पाया मैं खुद को,
    पर लगता है जैसे अब कुछ
    समझ रहा हूँ दूजों को और दुनिया को ….

    • ashwini kumar goswami says:

      @Vishvnand, अति सुन्दर आत्म-मंथन
      का वर्णन ! दोहावली-स्वरुप रचना में यदि मात्राओं के ११:१३ के अनुपात का
      ध्यान रखा जाए तो रचना पूर्ण उत्कृष्ट हो सकती है ! विशेषतः “खुद मैं पाल रहा
      हूँ” मैं मात्राओं की न्यूनता ज़रा खलती है जो इस प्रकार सम्यक हो सकती है:-
      “खुद मैं ही तो जो पाल रहा हूँ”

      • c.k.goswami says:

        @ashwini kumar goswami,
        “खुद को अब पहचाना मैंने ,जग सांचे में ढाल रहा हूँ
        कीड़े खुदगर्जी मक्कारी संग बे-इमानी के पाल रहा हूँ ”
        ये पंक्तियाँ संशोधित करके कविता में डाली जा सकती है.

    • c.k.goswami says:

      @Vishvnand, aapke bhav bilkul sahi utre hain vishwanandji .aapki tippani ke liye shukriya.

  2. SIDDHANATHSINGH says:

    achchhe flow me likhi gayi vyangyatmak rachna.

  3. Raj says:

    सुन्दर रचना, चंद्रकांत जी.

  4. rajdeep says:

    beautiful

    • c.k.goswami says:

      @rajdeep,किसी भी लेखक को जब अन्य कवियों की प्रतिक्रिया मिलती है तो उसे अपार ख़ुशी मिलती है ऐसी ही ख़ुशी मैं अनुभव करता हूँ जब विद्वान कवि अपनी प्रतिक्रया व्यक्त करते हैं.आपकी इस प्रतिक्रिया का तहे-दिल से शुक्रिया.
      टिपणी सकारात्मक हो या नकारात्मक पर अगर टिपण्णी मिली है तो यह निश्चित है की टीकाकार ने आपकी कविता पढ़ी है और ज्यादा से ज्यादा लोग पढ़ें,यही हर कवि की हार्दिक कामना होती है.

  5. ashwini kumar goswami says:

    ४ सितारों को बढ़ाकर ५ किये जाना समुचित होगा !

    • c.k.goswami says:

      @ashwini kumar goswami,
      ” आपने इसे फिर पढ़ा ,आंकलन किया सही
      सितारों से नवाजा काव्य को ,अपने मन की फिर कही”

  6. sushil sarna says:

    एक और लाजवाब प्रस्तुती – आत्म मंथन का बेहतरीन नमूना- मेरी और से हार्दिक बधाई सर जी

  7. sangeeta says:

    Ek atyant hi arthpoorna kataaksh aajkal ke adhikansh logon ke saamajik moolyon par. Badhaai!

    • c.k.goswami says:

      @sangeeta,
      “हम यूँ ही कटाक्ष करते जायेंगे
      खुदसुलझने की बजाय उलझते जायेंगे.”
      आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार.

  8. Sushil Joshi says:

    बहुत ही सुंदर एवं अर्थपूर्ण रचना है गोस्वामी जी। आपको मेरी ओर से बहुत-2 बधाई

    • c.k.goswami says:

      @Sushil Joshi,
      एक कटाक्षी व्यंगकार की बधाई दूसरे व्यंग्यकार कटाक्षी ने सहर्ष स्वीकार की.

  9. vmjain says:

    नि- संदेह एक बहुत अच्छी कविता. कटाक्ष भी और स्वयं पर खोज का चित्रण भी.

Leave a Reply