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कैसे लिखूं मैं शोक गीत

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July 2010 Contest
कैसे लिखूं मैं शोक गीत

सावन की रिमझिम फुहार है

मौसम खुशगवार है
चारों तरफ हरियाली है ,माहौल में बहार है
कैसे लिखूं शोक गीत ,दर्द में लिपटे शब्द नहीं हैं
लिखने तो बैठा हूँ पर ,शोक महसूस नहीं है
औपचारिकता निभाकर बनावटी शोक कैसे व्यक्त करूँ
झूठे आंसू लाकर अपनी आँखों से कैसे झरूँ
किसी ग़मगीन के घर जाकर ही ये मैं लिख पाउँगा
पर  दोस्त रिश्तेदारों में कोई मरा नहीं, शोक कहाँ से लाऊंगा
लिख सकता था उस दिन ये गीत जब ट्रेन दुर्घटना हुवी 
नक्सालियों के हमले से जब किसी की दुनिया बर्बाद हुवी 
 भयंकर  बाढ़  में जब   किसी का आशियाना उजड़ा हो 
कमाऊ  पूत के असामयिक निधन का जब दुखड़ा हो
जवान  मौत बिलखता परिवार देखता हूँ रोना जरूर आता है
तब शोक के स्वर निकलते हैं कितना क्रूर विधाता है
उस वक़्त नियति पर लिखने का मन करता है
शोक गीत लिखने को तब पेन सरकता है
शोक तो दिल से निकला दर्द होता है
जब खुद पे गुजरती है  तो पत्थरदिल भी रोता है
शोकग्रस्त की आवाज ही सच्चा शोकगीत लिख  payegi
जमीं से आस्मां  तक उसकी दर्दभरी आवाज गूँज जाएगी
झूठा शोक मैं बयाँ नहीं कर सकता
दिखावे का शोकगीत मैं नहीं लिख सकता
शोक गीत के नाम पर दो लाईने सबकी तरह मैं भी लिख डालता हूँ
“भगवान मृतात्मा को शांति प्रदान करे “लिख शोकगीत  का भ्रम पालता हूँ

———सी के गोस्वामीजयपुर

19 Comments

  1. H.C.Lohumi says:

    वास्तविक रचना गोस्वामी साहब.
    हार्दिक बधाई !!!
    ” उधर लबों पे मुस्कराहट नहीं तो, न सही,
    कह-कहे अपनी फितरत .कहाँ बदलते हैं. “

  2. Vishvnand says:

    सुन्दर रचना, खूबसूरत अंदाज़
    बधाई
    आपकी रचना पढ़ ख्याल आया
    ” हे भगवान्, जब शोक में डूबे हों, तो गीत रचें कैसा,
    खुद के शोक में औरों ने रचे शोकगीत ही सुनना अच्छा लगता …..”

  3. diwij says:

    आणि तुमचा आलेख्य – Its more pathetic anyhow

  4. Raj says:

    Well said.

  5. diwij says:

    औपचारिकता निभाकर बनावटी शोक कैसे व्यक्त करूँ
    बनावटी शोक is better than बनावटी poetry

    झूठा शोक मैं बयाँ नहीं कर सकता
    दिखावे का शोकगीत मैं नहीं लिख सकता

    then what do you write…?

    शोक गीत के नाम पर दो लाईने सबकी तरह मैं भी लिख डालता हूँ
    सबकी तरह…? aapki tarah likh kar bataun..?

    • c k goswami says:

      @diwij,
      शोक को शोक ही रहने दो
      बयाँ शौक से झूठा न करो
      कर सकते बयां झूठ, कलम आपकी ,बयां खूब करो
      आपको शोक जताने को रोका है भला हमने कब
      अपनी तो कलम रोएगी, देखेगी ग़मगीन को जब

  6. sushil sarna says:

    @c k goswami,
    सदैव की तरह आडम्बर और वास्तविकता की परतें खोलता और विवेकहीन शोक में अश्कों की गंगा बहाते चहरों का दर्पण – कलम के सीने में जब तक अंगारों सी तपिश नहीं होती उसके सीने से दर्द की स्याही नहीं निकलती-रचना के मध्य में लिखी पंक्तियाँ दिल पे अपना असर छोडती हैं- इस भावपूर्ण रचना के लिए क्या लिखूं फिर भी दिल की असीम गहराईयों से आपको और आपकी कलम को सलाम सर जी

    • c.k.goswami says:

      @sushil sarna, सर्वप्रथम आपकी लेखन शैली के लिए और फिर इस कविता पर दी गयी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद.

  7. parminder says:

    आपकी सोच को प्रणाम है गोस्वामी जी| सही है, दर्द सहने पर ही अभिव्यक्ति होती है और मगरमच्छ के आंसू बहाना हर किसी के बस की बात भी नहीं| पर मैंने बहुतों को देखा जो केवल महसूस करके लिख देते हैं|

  8. siddhanathsingh says:

    jahaan n pahunche ravi vahaan pahunchta kavi, chot kha kar vilap to janvar bhi karta hai, samvedna ke star par mahsoos kar use sarvjaneen bana dena hi kavita ka kartvya hai meri nazar me.

    • c.k.goswami says:

      @siddhanathsingh, मेरी राय में सम+वेदना ही संवेदना है .वेदना की कल्पना नहीं की जा कर उसे महसूस किया जाये तब ही सांत्वना देना साकार होता है. सावन के मौसम में मस्ताये चेहरे देख कर दर्द कहाँ से जागृत हो सकता है सरजी . उन्हें देख कर कोई ग़मगीन चेहरे की कल्पना कैसे कर सकता है.हाँ इस बात से में अवश्य सहमत हूँ की वो कवी ही क्या जो कल्पना की उड़ान न भर सकता हो.

  9. rajdeep says:

    a nice write sir

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