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हुआ ये कैसे ख़याल पैदा.

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Hindi Poetry

लगी कुहुकने जहाँ भी कोयल,

हुआ वहीँ पर जमाल पैदा.                (जमाल = ख़ूबसूरती, सुन्दरता, हुस्न)

कमी नहीं  कद्रदां की कोई

करे तो कोई कमाल पैदा.

रही जहाँ पापियों की बस्ती,

हुआ वहीँ पर अकाल पैदा.

नहीं है मुमकिन इस मतलबी जहाँ में ,

होगा  कोई सच्चा  नमक हलाल पैदा.

हुआ है जबसे मुझे इश्क़ तुझसे,

हुआ तभी से ये जंजाल पैदा.

साज़िश मुझे दूर करने की तुझसे,

किया है रकीबों  ने ही वबाल पैदा.         (वबाल = झंझट)

तेरे बिना रह सकूंगा मै ज़िन्दा,

हुआ ये कैसे ख़याल पैदा

 

22 Comments

  1. siddhanathsingh says:

    मैं शेरों में कुछ संतुलन करने की धृष्टता करूँगा सर,-
    जहाँ भी कूकी चमन में कोयल
    हुआ वहीँ पर जमाल पैदा.
    कमी न कोई है कद्रदान की,
    करो तो पहले कमाल पैदा.
    जहाने मसरफ में कब है मुमकिन,
    जो हो नमक का हलाल, पैदा.
    हुआ है तुझसे ये इश्क जब से,
    हुआ ये जी का जंजाल पैदा.
    जो साजिशन तुझसे दूर कर दे,
    रकीब करते वबाल पैदा.
    तेरे बिना रह सकूँगा जिंदा
    हुआ भी कैसे ख़याल पैदा.
    जवाब देने लगीं है सांसे
    हुए हैं इतने सवाल पैदा.

  2. c.k.goswami says:

    उर्दू अल्फाज़ में जो पकड़ सिद्धनाथ सिंघजी की है वैसी हर किसी में नहीं.आपकी सोच बहुत अच्छी थी जिसे प्रवाह देकर सिंह साहिब ने और भी सुगम कर दिया.
    अच्छी काव्य रचना.

  3. Vishvnand says:

    भायी दोनों नज्में बहुत ज्यादा
    जो पहले की, जैसी हुई थी पैदा,
    और बाद की जैसे उसे सवाँरा गया,
    दोनों को पढ़ने में मिला बहुत फ़ायदा ….

  4. prachi sandeep singla says:

    good effort 🙂

  5. sushil sarna says:

    गजल आपकी भी बहुत अच्छी थी उसपर सिंह साहब ने जो उसका रूप संवारा उस और भी निखर आगया, बहरहाल,आप दोनों ही बधाई के हकदार हैं

  6. parminder says:

    आपके द्वारा लिखी गयीं पंक्तियाँ व् सिंह साहब द्वारा लिखी पंक्तियाँ दोनों ही पढ़कर आनंद आ गया| बहुत सुन्दर!

  7. Raj says:

    सोने पर सुहागा. बहुत सुन्दर.

  8. U.M.Sahai says:

    मेरी इस ग़ज़ल पर सिद्ध नाथ जी, गोस्वामी जी, विश्व जी, प्राची जी, सरना जी, परमिंदर जी व राज जी ने अपनी टिप्पड़ी व सुझाव दिए हैं. मैं आप सभी का तहे-दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ. सिद्ध नाथ जी का उर्दू ज्ञान निश्चित रूप में कई लोगों से बेहतर है. वे मेरे बहुत अच्छे मित्र हैं और मै उनकी ग़ज़लों/कविताओं का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ, पर यहाँ मै सभी से कुछ कहना चाहता हूँ:
    १.किसी को भी दूसरे की कविता में कोई छेड़-छाड़ नहीं करनी चाहिए और न ही किसी को अपनी विद्वता दूसरे कवि की कविता पर दिखानी चाहिए, अन्यथा यदि लोग दूसरे की कविता को सुधारने में या उस पर अपनी विद्वता दिखाने में लग जायंगे तो इसका कोई अंत नहीं है.
    २.हरेक कवी की अपनी सोच और स्टाइल होती है.
    ३.किसी भी लाइन/शेर को कई तरीकों से कहा जा सकता है, जैसे
    कठिन घड़ियाँ जिंदगी में दो ही गुजरी है मुझ पर या
    जिंदगी में कठिन घड़ियाँ दो ही गुजरी हैं मुझ पर या
    जिंदगी में दो ही घड़ियाँ कठिन गुजरी हैं मुझ पर या
    कठिन घड़ियाँ दो ही गुजरी हैं हमारी ज़िंदगी में आदि-आदि
    इसलिए ये कहना की ये लाइन उससे बेहतर है उचित नहीं है क्योंकि हरेक कवि का अपना अलग नजरिया होता है.
    ४.मेरी ग़ज़ल के पहले शेर में मैंने जो कहना चाहा है वो यह कि कोयल की आवाज़ इतनी मधुर होती है कि वह जहाँ भी कूकती है या बोलती है वही का माहौल सुंदर हो जाता है, चमन तो वैसे ही सुंदर होता है वहां पर कोयल बोले या न बोले उससे कोई फर्क नहीं पड़ता है. इसलिए यहाँ पर चमन का कोई मतलब नहीं है.
    ५. हमेशा नमक हलाल या नमक हराम शब्दों का ही प्रयोग किया जाता है, नमक का हलाल सही नहीं है.
    इसी तरह और भी कई बातें है किन्तु समय कि कमी कि वजह से मै अपनी बात को यहीं पर समाप्त कर रहा हूँ.
    सभी को मेरी तरफ से पुनः बहुत-बहुत धन्यवाद.

    • Vishvnand says:

      @U.M.Sahai
      I personally feel the sentiments mentioned above by you are quite correct and pertinent and I commend you for the response..
      I feel a member/reader can give in the comments section his comments or his suggestions for correction to the poem if he feels any, but it is not correct or prudent to post openly a corrected version of another author’s poem in ones words alongside the original poem. If one feels so impulsively about the poem to redraft the poem, which one does feel sometimes about some good poems, my opinion is that he can send his correction/ poem separately in a email to the author for his information if he so chooses and which may be a proper thing to do.

  9. Harish Lohumi says:

    ग़ज़ल के शीर्षक का सौतेला भाई- ” हुआ कैसे ये बवाल पैदा”

    • U.M.Sahai says:

      @Harish Lohumi, ये कोई बवाल नहीं है, सिर्फ अपने-अपने सोचने का ढंग है. anyway, बहुत धन्यवाद.

  10. siddhanathsingh says:

    इ ऍम सॉरी सर इफ इट एनी वे हर्ट्स यू,

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