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मैं तो कब का मर गया

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Hindi Poetry

मैं तो कब का मर गया
अब तो बस छाया है
लम्बी देह नौ दरवाजों
की थोथी काया है

सबसे पहले मरा पेट  में
रोया देख कर माँ को
दूजे देख हकीक़त अपनी
और बदर्द जहाँ को
वो जननी ही जब दुःख भोगे
सपना खुद बिखराया   है
लम्बी देह नौ दरवाजों
की थोथी काया है

तीजे अपनी नार की खातिर
तोड़ी रिश्तेदारी
चौथी भुला मान मनोवल
भूल गया खुद्दारी
पंचम भूखे देख भाई को
जब ये मन हर्षाया  है
लम्बी देह नौ दरवाजों
की थोथी काया है

अपने को मुर्दा  कहने की
गलती नहीं  सुहाई
बहिनों की इज्जत से फिर क्यों
खेल रहें है भाई
अपने को अपना ना माने
कौन  यहाँ पराया है
लम्बी देह नौ दरवाजों
की थोथी काया है

One Comment

  1. kishan says:

    acha he

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