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“बदला-बदला मेरा देश “

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Aug 2010 Contest, Hindi Poetry

क्या करूँ बयां तुम्हे कैसा था मेरा देश,
कहने को शब्द नहीं शब्द-कोष में शेष,
हर धर्म का रंग है सिमटा जैसे इन्द्रनुष,
अपनी मर्ज़ी का भेष पहने हर मानुष,
अपनी मर्ज़ी से जीने की है ऐसी आज़ादी,
चाहे पहने सिल्क या चाहे पहने खादी,
हर तबके को है बोलने का अधिकार,
आपस में प्यार के थे सब में संस्कार,
पर लगता है आज हवा बदल रही है,
प्यार की जगह शायद नफरत ले रही है,
हर ईमानदार अब भ्रष्टाचारी बन रहा है,
नाज़ुक हाथ खिलौनों की जगह बन्दुक चुन रहा है,
जिन आँखों में सपना था भारत को सोने की चिड़िया बनाने का,
वे ऑंखें गिद्ध को बसेरा देने का ख्वाब सोच रही है,
कल का भारत सोचकर ही रूह कांप जाती है,
हालात ऐसे हँ कि सांच को आंच आती है,
बरसों पहले मेरा देश फूल गुलाब का था,
कांटे तो तब भी उसमे थे मगर वे गुलाब के रक्षक थे,
वक़्त ऐसा आया कि अब वो रक्षक ही भक्षक बन गए.

5 Comments

  1. siddhanathsingh says:

    सोच लीजिये अब तो भारत में गिद्धों की संख्या भी बुरी तरह घट गयी है इ har तबके को बोलने का अधिकार तो है मगर कुछ कहने का शायद नहीं,
    सड़ता है गोदाम में गेहूं टनों अपार
    और करोड़ों पेट है भूखे और लाचार.
    झंडा ऊंचा रख रहा मेहनत का उत्साह.
    भ्रष्ट वृत्तियाँ कर रहीं सब कुछ किन्तु तबाह.

  2. Vishvnand says:

    अतिसुन्दर है आपकी ये रचना और इसका सम्पूर्ण सार
    इसमें हैं हमारी सारी व्यथाएं और मन के देशपर विचार
    बहुत प्रशंसनीय है आपका कथन और ये कविरूपी प्रयास
    रचना के लिए आपको बहुत बधाई और हार्दिक धन्यवाद …

  3. pratiksha says:

    बहुत सुन्दर लिखा है…
    देश को इतने कम शब्दों में लिखना सराहनीय hai

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