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अतृप्त सोच

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Hindi Poetry
कुछ हम गायें कुछ तुम गाओ ,मिलकर एक सुर में ढल जाएँ
ना फिर कोई अभिलाषा हो, ना फिर कोई मन प्यासा हो
सुर संगम की मधुशाला में, ह्रदय मिलाप की भाषा हो
  
कोमल  मन है इठलाता, सुर ही मन को है भाता
मेरे इस पागल मन को,प्रेम सिवा कुछ न आता
  
सौंदर्य की देवी तुम हो, रूप तुम्हारा निश्छल है
प्रेम की गागर भर प्रकट हुआ मैं,संग डूबो यह दलदल है
  
स्वार्थ मेरा यह लेश मात्र  है, तुमको पाने की आशा  है
मेरे शब्दों के मोह जाल ने, हर अंग-अंग तराशा है
  
हे! कोमलांगी तुम कहाँ चलीं, ‘दो गागर’ जीवन रस भर लाओ
एक तुम पी लो, एक मुझको दो, अब और न मुझको तरसाओ
  
तुम सुन्दर हो,कवि की कविता सी, हिरनी जैसे हैं नयन प्रखर
शब्दों को बहुत मरोड़ा है, तुम भी न जाना कहीं बिखर
  
बहुत हुआ आना जाना, लो ह्रदय पाश में बंध जाओ
मैं कवि हूँ,कविता करता, सांसो से दिल में उतर जाओ
 
 
 
 

7 Comments

  1. rajiv srivastava says:

    Aamin–bhagwan aap ki manokamana poori kare.kintne pavitra shabdo se rach gayi hai ye rachna badahai

  2. Vishvnand says:

    अति सुन्दर मोहक भावार्थ लिए
    बड़ी मनभावन रचना .
    हार्दिक बधाई .

    “कुछ हम गायें कुछ तुम गाओ ,मिलकर एक सुर में ढल जाएँ
    ना फिर कोई अभिलाषा हो, ना फिर कोई मन प्यासा हो
    सुर संगम की मधुशाला में, बस ह्रदय मिलाप की भाषा हो” ….संगीत के प्रति अति सुन्दर भाव. बहुत खूब.

    कहीं कहीं लय में विसंगति सुधारने की जरूरत महसूस हुई.

  3. Harish Chandra Lohumi says:

    बहुत ही नाजुक सी सुन्दर रचना एक कोमलांगी की तरह !
    बधाई नितिन जी !!!

  4. Ruchi Misra says:

    बहुत ही सुंदर सृजन

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