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संवाद – पिता-पुत्र

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Hindi Poetry

क्या कहा,

मैं स्वर विहीन हूँ

मैं बंजर जमीन हूँ

मैं कर्तव्यहीन हूँ

मैं दीन-हीन हूँ

मैं जीर्ण-शीर्ण हूँ

मैं अस्तित्वहीन हूँ

मैं लेश मात्र हूँ

मैं घृणा का पात्र हूँ

मैं क्षणिक मात्र हूँ

मैं हंसी का पात्र हूँ

 

तुमने सत्य ही कहा,

शायद तुम्हे याद न रहा

कि तुम्हारी धमनियों में

 खून किसका बह रहा?

 

तुम्हारी जिहवा को स्वर किसने दिए

तुम्हारे बदले, आंसू किसने पिए?

जब-जब गिरे तुम,आगे बढ़कर तुम्हारे

हाथ किसने थाम लिए?

 

जब भी तुम्हारी राह में कोई अड़चन आई

या जब भी तुम्हे कोई चीज पसंद आई

या जब भी तुम्हारी आँखों में नमी छाई

क्या तुम्हे याद है किसने?

किसने? किसने की वो सारी भरपाई?

जो देखे तुमने सपने थे,पूछो वो किसके अपने थे

और किसने अपनी जीवन भर की सारी कमाई

सिर्फ उनको पूरा करने में लुटाई?

 

आज बहुत तुम बड़े हो गए,अपनों पैरों पे जो खड़े हो गए

और बहुत खूब फ़रमाया है,क्योंकि दौलत का नशा जो छाया है

 

पिता-पुत्र संवादों को सुन, पौत्र  मेरा  निकल आया

कोमल मन का बालक वो,कुछ कहने को था अकुलाया

बोला,पापा मैं बेटा हूँ किसका, यह परिपाटी न तोडूंगा

सही समय आने दो, कुछ ऐसा ही मैं भी बोलूँगा

 

 

 

 

 

 

11 Comments

  1. rajivsrivastava says:

    bhai wah nitin ji kya samvaad hai ek dam saach –par insaan ye kyo bhool jata hai ki jaisa kareega vaisa bhareega

  2. Harish Chandra Lohumi says:

    सही समय आने दो,
    कुछ ऐसा ही मैं भी बोलूँगा,
    आप तो बेटे की हैसियत से बोल रहे हो…
    मैं बाप बनकर बोलूँगा ।

    बहुत सुन्दर नितिन जी,
    हार्दिक बधाई !!!

  3. pallawi says:

    bohut bhai aapki ye rachna!!

  4. Vishvnand says:

    बहुत अर्थपूर्ण सुन्दर रचना,
    अपने उम्र के हिसाब से इसकी जल्दी समझ आय तो बड़ी अच्छी बात होती है
    पर अक्सर जब ये समझ आती है तो बहुत देर हो गयी होती है. 🙁

    It is said that the parents who are lucky to have the type of children they have invariably have children who are lucky to have the type of parents they have… 🙂

  5. Dhirendra Mishra says:

    Very nice Nitin. Mind-blowing…

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