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“पौराणिक कशमकश”

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Crowned Poem, Nov 2010 Contest

 ॐ श्री गणेशाय नमः

 

 ‘यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युथानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥’

 

सदियों पुरानी बात है, सबको अभी भी याद है,

वर्णन यहाँ जिसका हुआ है,वो ईश्वर-भक्त संवाद हैं।

“कशमकश” की जंग छिड़ी थी, युद्ध के मैदान में,

चकित हो सब थे खड़े, हाथों धनुष और बाण ले॥१॥  

 

 सारथी श्री कृष्ण  ने रथ सम्मुख ला खड़ा किया,

स्वजनों को देख कौन्तेय मन करुणा से भर गया।

युद्ध अपनों के विरुद्ध, व्यर्थ है हे! ईश्वर,

अर्जुन ह्रदय  हो विषादयुक्त, था दुविधा में पड़ गया॥२॥

 

 हे! वासुदेव,

क्यों ले रहे तुम, परीक्षा इतनी कठिन?

निशब्द हूँ,शिथिल हूँ, आत्मा क्यों इतनी मलिन?

उस छोर पर सारे हमारे, कुटुंब के प्राणी खड़े,

क्यों उसी ओर पर अस्त्र-शस्त्र  ले हम बढे॥३॥

 

 हे! देवकीनंदन,

राज-पाठ का लोभ मुझे न, हिंसा से घबराता हूँ,

कुल का नाश न सह पाऊँगा ,रण  छोड़ मैं जाता हूँ।

मुझपर  प्रहार करें चाहें सबमैं ना शस्त्र उठाऊँगा,

कौरवों का वंश मिटने का, पाप  ना मैं सह पाऊँगा॥४॥

 

 हे! पार्थ,

जीवन-मृत्यु का नियंत्रण, न किसी के हाथ है,

आत्मा को मार पाना, नासमझी की बात है।

शरीर  नश्वर है हमारा, आत्मा मरती नहीं,

एक शरीर त्यागकर, नवरूप धरती है कहीं॥५॥

 

 तनिक भी विचलित न हो, क्षत्रिय धर्म पालन करो,

फल की चिंता से मुक्त होकर, कर्म कर दुविधा हरो॥६॥

 

 व्यर्थ जीतें हैं मनुष्य, जिन्हें सृष्टिचक्र का न बोध है,

अन्न से प्राणी हुए, और अन्न वृष्टि से बना,

वृष्टि यज्ञ से मिली, और यज्ञ कर्म से मिला,

कर्म वेद में विहित है, और वेद ब्रह्मा ने जना॥७॥

 

 धर्म की जब-जब हानि हुई है ,अधर्म,पाप जब बढ़ता है,

हर युगमें  हे! पार्थ, ‘परंब्रहमा‘, धर्म संस्थापना करता है।

सज्जन की रक्षा करने को और दुर्जन के संहार हेतु,

हर युग में यह अविनाशी नव रूप धारण करता है॥८॥

 

 पंचतत्व सब मुझ मे है, मैं संपूर्ण जगत कर्ता-धर्ता,

वेदों की श्रुतियां मुझसे हैं, पाप-पुण्य सब मुझमे बसता।

शोक त्याग, संताप हरो, उठो गांडीव धारण करो,

हे! अर्जुन अब न देर करोसब शत्रु हैं आक्रमण करो॥९॥

 

 हे! मधुसूदन, अनुग्रहित हुआ मैं,

गूढ़ ज्ञान पा, अन्धकार मिटा,

विलुप्त हुई दुविधा मेरी,

नतमस्तक हूँजो यह रूप दिखा॥१०॥

 

 आप ही वायु हैं, आप ही अग्नि और यम हैं,

आप में ही हो रहा वरुण का वास है,

आप ही चन्द्र हैं,प्रजापति भी आप हैं,

आप ही में हो रहा,मेरी कशमकश का नाश है॥११॥

 

 खोई सुध-बुध पायी मैंने,

पथभ्रष्ट  न कोई कर पायेगा।

इस युद्ध भूमि जस कर्म करेगा,

तस ही फल वह पायेगा॥१२॥

 

 श्री कृष्ण मुख निकले वचन,

संपूर्ण गीता सार हैं।

किस विधि हम जीवन जियें,

यह उस विधि का आधार हैं॥१३॥

 

 यह ज्ञान जिसने अर्जित किया,

तज स्वार्थ, परहित जो जिया,

जीवन की हर कशमकश से,मुक्त वह हो जायेगा,

परमात्मा में लीन होकरवह सदगति को पायेगा॥१४॥

 

 जीवन की हर कशमकश से,मुक्त वह हो जायेगा

परमात्मा में लीन होकरवह सदगतिको पायेगा……….

 

 

 

 

32 Comments

  1. vibha mishra says:

    नितिन जी बधाई स्वीकारें ……आपकी जो शैली है वह न केवल प्रशंसनीय है वरन आदर के योग्य भी है …आपकी रचनायें सदा ही मील का पत्थर साबित होती है ..आपकी रचनाएँ पढ़कर श्री दिनकर जी और निराला जी की स्मृति जागृत हो जाती है ….हार्दिक अभिनन्दन

    • nitin_shukla14 says:

      रचना आपको अच्छी लगी, कृपया आभार स्वीकारें
      रही बात शैली की तो मैं निरंतर प्रयासरत रहता हूँ की लेखनी मैं हमेशा सुधार होता रहे
      जिन महान कवियों की आपने बात की हैं उनके तो चरणों की धूल भी नहीं हूँ मैं
      इतना सम्मान देने के लिए हार्दिक धन्यवाद
      वैसे इस रचना की सृजन करने में मुझे जितना वक्त लगा हे, उतना आजतक किसी भी रचना को लिखने में नहीं लगा
      उमींद करता हूँ सभी को पसंद आएगी

  2. Abhishek Khare says:

    बहुत ही शानदार कृति है | ये आपकी रचना और चमके इसलिए हमने भी सितारे जड़ दिए है |

    • nitin_shukla14 says:

      अभिषेक जी बहुत-बहुत धन्यवाद रचना की इतनी प्रसंशा करने के लिए
      ईश्वर करे ऐसे हजारों सितारे आपके जीवन को सदा रोशन करते रहें

  3. Harish Chandra Lohumi says:

    100/100 मेरी तरफ़ से !
    लखनऊ महोत्सव प्रारम्भ होने ही वाला है नितिन जी !!!

    • nitin_shukla14 says:

      धन्यवाद हरीश जी, आपको रचना अच्छी लगी , मेंरी मेहनत सफल हो गयी
      लखनऊ और लखनऊ महोत्सव गए तो एक जमाना बीत गया, मुझे याद है Nov /Dec में ही होता है.

  4. rajiv srivastava says:

    Baat bahut purani hai ,aur sab ko jaani mani hai–krishn aur parth ka samvad kurkshetre ke anmol nishani hai .Par aaj ek bar phir se sajiv kar diya us samvad ko———– bahut khoob — badahai

    • nitin_shukla14 says:

      आपके इस स्नेह के लिए मै बहुत-बहुत आभारी हूँ
      प्रयास किया है,आप सभी को अच्छा लगा, मेंरा लेखन सफल हुआ
      Thank You so much….

  5. dr.paliwal says:

    लाजवाब………….

    • nitin_shukla14 says:

      डॉक्टर साहब मैं बहुत ही खुशनसीब हूँ जो यह रचना आपको पसंद आई

  6. Vishvnand says:

    क्या बात है
    उत्कृष्ट, सुन्दर अध्यात्मिक अर्थपूर्ण और मनभावन
    इस रचना के लिए हार्दिक अभिवादन

    • Vishvnand says:

      और हाँ, अपने profile पर अपने बारे में जरूर कुछ हमें बताइये जो अभी blank है

      • nitin_shukla14 says:

        जरूर सर मैं अवश्य ही Update करूँगा ,
        वास्तविकता यह है कि मैं प४ पर अपनी पहचान अपने व्यक्तित्व या व्यवसाय से नहीं बल्कि अपनी रचनाओं से बनाना चाहता था
        और शायद अब समय आ गया जब आप सभी गणमान्य जनों के बीच मैं एक छोटा सा स्थान गृहण कर पाया हूँ

    • nitin_shukla14 says:

      सर!
      मन बहुत ही प्रसन्ना है , कि आपको रचना पसंद आई
      अर्थपूर्ण अब हुई, जब आपका कमेन्ट आ गया
      THANK YOU SO MUCH SIR

  7. neeraj guru says:

    गीता हमारे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक आधार है.मुझे गीता कई अर्थों में गहरे प्रभावित करती है.इन दिनों मैं गीता पर ओशो के प्रवचन ही सुन रहा हूँ.यहाँ आप जिस श्लोक को उद्धत कर रहे हैं,वह विश्व में सभी धर्मों में किसी न किसी रूप में अन्तर्निहित है.आज पुरे विश्व में हम जिन भी सुपरहीरो को जानते हैं वह सभी इसी अंतर्धारा से उपजे है.हमारे सारे युद्ध और हमारी लड़ाई स्वयं हमसे ही है,हमारी अपनी प्रतिच्छाया से ही है और उसमें एक अंतर्द्वंद या कशमकश आना स्वाभाविक है और यहीं पर कृष्ण उसका समाधान लेकर प्रस्तुत होते हैं.ध्यान रहे गीता सिर्फ युद्ध के मैदान में ही घट सकती है और आज के मनुष्य के पास उसके मन से बड़ा युद्धक्षेत्र कहीं नहीं है-कुरुक्षेत्र कहीं नहीं है.इसलिए गीता आज भी उतनी ही प्रासंगिक है.
    खैर मेरे पास गीता पर कहने को बहुत कुछ है,अभी तो आपको इस काव्यमय प्रस्तुति के लिए बधाई देता हूँ.कविता का निर्बाह अच्छा हुआ है.

  8. neha goyal says:

    बहुत बधाई नितिन जी , अति सुंदर रचना बहुत मन भावन

  9. sudha goel says:

    पौराणिक कशमकश को अपने शब्दों में इतने सुन्दर ढंग से व्यक्त करने के लिए आप सचमुच बधाई के पात्र हैं !

  10. Harish Chandra Lohumi says:

    हमारा मूल्यांकन 100% ठीक निकला नितिन जी । 🙂
    हार्दिक बधाई !

    • nitin_shukla14 says:

      Aap Harish Ji Hain aap kabhi galat nahi ho sakte, aap ka pura naam hain Harish Chandra, aur aap use poori tarah saakar karten hain.
      Thank you so much…..

  11. sushil sarna says:

    ये रचना वास्तव में मंच की शोभा है और जीत के काबिल है-मेरी और से आपको हार्दिक बधाई नितिन जी

  12. medhini says:

    Hearty congratulations,Nithin, the winner.

  13. P4PoetryP4Praveen says:

    गीता सार को आपने बड़े ही अनूठे व रोचक अंदाज़ में प्रस्तुत किया है नितिन जी…
    आपकी रचना के लिए बहुत-बहुत बधाई और मेरी ओर से ( 5 * * * * * ) सप्रेम भेंट… 🙂

  14. parminder says:

    बहुत बधाई नितिन जी! बहुत समय से इस मंच से गायब हूँ और इतनी सुन्दर रचनाओं का लुत्फ़ नहीं उठा पा रही| सच, कृष्ण जी के दिए अनमोल वचन आपने अपने शब्दों में बहुत सुन्दर ढाले हैं! पूरा गीता सार सामने आ गया!

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