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हाल-ए-इश्क

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Hindi Poetry
इनायत उनकी हम पर है
लगा है हर तरफ मेला
वफ़ा के नाम पर जालिम
क्या खूब खेल है खेला
 
तुनककर बैठे हैं जाकर 
ग़ैर के आगोश में जबसे
जहाँ छोड़ जाने को
यह दिल करे तबसे
 
हमारी आशिकी को
यह अच्छा सिला मिला
जनाज़ा जब जहाँ निकला
हर आशिक मरा मिला
 
 
 
 
 

13 Comments

  1. Vishvnand says:

    रचना अच्छी मन भायी, बधाई
    पर आपको ये हारनेवाली टीम आज क्यूँ रास आयी ?
    बेवफाई में रोने से अच्छा है बेवफा होना
    अगर कुछ गल्त कहा तो please हमें माफ़ करना 🙂

    • nitin_shukla14 says:

      सर्वप्रथम धन्यवाद है सर कि रचना आपको पसंद आई
      परन्तु आज कुछ हटके लिखने की इच्छा मन में उभर आई
      और मन के हाँथ विवश हो, हमने कलम उठाई
      बहुत सोचा, अंततः आशिकी पर कुछ पंक्तियाँ याद आयीं

      “मुहब्बत में कभी हार नहीं होती
      हर किसी हथियार में धार नहीं होती
      हम तो शायर हैं,बेबाक़ लिख देते हैं
      क्यूंकि विचारों के बीच दीवार नहीं होती”

      सर आपका कमेन्ट हमेशा सर आँखों पर,
      कोई खास कारण नहीं था ऐसा लिखने का,बहुत ही खुश होकर लिखा हैं मैंने

      • Vishvnand says:

        @nitin_shukla14
        नए नए प्रयोग करना और share करना
        तो यहाँ कवियों का हक़ ही है समझना,
        जैसी जैसी भावनाएं उभरें उन्हें ही तो है
        अपनी कलम से प्रदर्शित करना,
        आपकी अलग सी सुन्दर रचना पढ़ जो भाव मन में उभरे
        उन्हें ही मेरा मकसद था मजे से कह देना
        Please इसे कोई serious प्रतिक्रिया सी नहीं मानना
        मैंने इसलिए कहा था माफ करना …
        क्यूंकि “बेवफाई में रोने से अच्छा है बेवफा होना”
        ये बस उपदेश है नहीं सहज है ऐसा कुछ करना…

        • nitin_shukla14 says:

          सर, इतने समय में p4 poetry का मंच जीवन का एक हिस्सा बन गया है और उसके सारे सदस्य, परिवार के सदस्यों सा अहसास दिलाते हैं, और घर के लोगों की बातों का बुरा नहीं माना जाता, खासकर आपकी बात का तो बिलकुल ही नहीं, क्योंकि आपके आशीर्वाद बिना तो कोई भी रचना मुझे स्वयं को अच्छी नहीं लगती

          और यह बार-बार माफ़ी शब्द का प्रयोग करके मुझे शर्मिंदा ना करें, अगर मुझसे कभी कोई भूल चूक हुई तो मांफ करें और अपना आशीर्वाद एवं स्नेह इसी प्रकार बनाये रखें
          फिर कहूँगा मैं आपकी कोई भी सलाह या कमेन्ट को कभी अन्यथा नहीं लेता

  2. Harish Chandra Lohumi says:

    बहुत अच्छे नितिन जी ! इधर भी कुछ-कुछ होने लगा –

    तनिक जो झाँक कर देखा,
    जिगर का अपना आईना,
    उसी के ख्वाब चटके थे,
    वो जालिम फ़िर भी आयी ना ।

    • nitin_shukla14 says:

      Continue रखें क्या ?

      जो वो गर आ जाती कहीं, ज़िगर के रस्ते से
      शहर में बदनाम होते थे,इज्ज़त बिकती सस्ते से

  3. rajivsrivastava says:

    kuch hat ke hai ,jo cheej hat ke hoti hai wo dheere dheere jahan main utarti hai-par mere jahan main turant utar gaye hai–badahai

    • nitin_shukla14 says:

      धन्यवाद राजीव

      कवि, कवि को समझे है
      हर आशिक, आशिक को
      कविता से इश्क को जो समझे है
      उससे बड़ा न कोई आशिक हो

  4. pallawi says:

    aap ek versatile poet hai hr topic pr bohut badhiya likhte hai !!
    pasand aayi ye rachna!!

  5. vibha mishra says:

    aapne kiya yun haal-e ishq ka izhaar
    ki aapke aa jaane se p4 poetry per aa jati hai bahaar
    umda rachna nitin ji ………badhai

  6. prachi sandeep singla says:

    good attempt 🙂

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