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कोरे पन्ने

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Hindi Poetry

कुछ पन्ने बचा लिये थे मैनें

उडने से,

कल शाम की आन्धी में

मेरी मेज़ पर रखे

सारे पन्ने उडने लगे थे

मुझे ऐसा लगा था

जैसा मैं

कई हिस्सों मे बट कर

इधर उधर उडने लगा था

क्युंकि उन पन्नों पर

सिर्फ इक नाम बस लिखा था

और वो इक नाम ही

मेरी ज़िन्दगी बन गयी थी

मगर कल की आन्धी

सारे पन्ने उडा ले गयी

और जब मैनें

अपने हाथ मे बचे हुये पन्नों को देखा

तो वो भी मेरी तरह

कोरे निकले !

4 Comments

  1. अच्छी रचना – बधाई
    मन के आबेग को अच्छा दरसाया है आपनें

  2. Harish Chandra Lohumi says:

    मगर कल की आन्धी
    सारे पन्ने उडा ले गयी.. क्या सटीक लगता है यहाँ पर ? हो सके तो परिवर्तन करें ।
    कुछ शब्द भी गलत छपे हैं । क्रपया सुधार करें ।
    Theme बहुत अच्छी है ! बहुत अच्छा प्रयास ! बधाई !

  3. siddha Nath Singh says:

    बहुत सुन्दर भावान्विति, परन्तु “और वो इक नाम ही मेरी ज़िन्दगी बन गयी थी”– इसमे “–ज़िदगी बन गया था” होना चाहिए व्याकरण के लिहाज़ से. क्यों?

  4. anju singh says:

    दिल की भावना को कहने का बढ़िया अंदाज पर सिद्धनाथ सर हरीश चन्द्र सर की बात से भी पूर्णतः सहमत हूँ.. बस थोडा सा सुधार…

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