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बचपन

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Hindi Poetry

वो बचपन की खुशबू
वो बचपन की यादें
वो गुज़रा हुआ ज़माना
अब भी मुस्कान वो ला दें

वो आँगन का झूला
सर्दियों मे नरम रजाई
गुसलखाने से नफरत
खिलोनो मे खुशी पाई

जीने की न कोई हद थी
सितारे दिन मे भी दिखते
मस्ती हर साँस से झलकती
कभी पढते तो कभी लिखते

वो नानी का बना हलवा
चाची की हरी चटनी
तूफ़ान मेल सा दिन भगाते
मिनटों मे रातें भी कटनी

इन्द्रधनुष सी सुन्दर तितली
भूख का न कभी ठिकाना
माँ से लड़ना झगड़ना
फिर वोही बनती सिरहाना

वो बचपन की मौजें
वो बचपन की मस्ती
क्या मोल लगाऊं उनका
सबसे बढ़िया , सबसे सस्ती

11 Comments

  1. Vishvnand says:

    बचपन की तुम्हरी बातें
    पढ़ हमरा मन ललचाया
    लगता तुम थे बड़े नटखट
    बहुतों की आँख का तारा
    इस मधु मोहक रचना पर
    लो अभिनन्दन भी हमारा…

  2. Harish Chandra Lohumi says:

    विजू जी आपका प्रायस सराहनीय है । लेकिन मुझे लगता है कि शब्द और मात्राओं के नियन्त्रण ने भाव- अभिव्यंजनाओं के प्रवाह को भी नियन्त्रित कर दिया है इस रचना में । कहने का मतलब है कि रचना को “खुल कर” नहीं लिखा गया है ।
    और भी आकर्षक बन सकती है ये रचना । वैसे प्रयास मन भाया ।

    और इस रचना की याद दिला दी आपन…….।

    ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो,
    भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी।
    मग़र मुझको लौटा दो बचपन का सावन,
    वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी।

    मोहल्ले की सबसे निशानी पुरानी,
    वो बुढ़िया जिसे बच्चे कहते थे नानी,
    वो नानी की बातों में परियों का डेरा,
    वो चेहरे की झुर्रियों में सदियों का फेरा,
    भुलाए नहीं भूल सकता है कोई,
    वो छोटी-सी रातें वो लम्बी कहानी।

    कड़ी धूप में अपने घर से निकलना
    वो चिड़िया, वो बुलबुल, वो तितली पकड़ना,
    वो गुड़िया की शादी पे लड़ना-झगड़ना,
    वो झूलों से गिरना, वो गिर के सँभलना,
    वो पीपल के पल्लों के प्यारे-से तोहफ़े,
    वो टूटी हुई चूड़ियों की निशानी।

    कभी रेत के ऊँचे टीलों पे जाना
    घरौंदे बनाना,बना के मिटाना,
    वो मासूम चाहत की तस्वीर अपनी,
    वो ख़्वाबों खिलौनों की जागीर अपनी,
    न दुनिया का ग़म था, न रिश्तों का बंधन,
    बड़ी खूबसूरत थी वो ज़िन्दगानी।

  3. anju singh says:

    वाह… रचना पढ़कर तो बचपन की यादें ताजा हो गई और कमेन्ट पढ़कर तो बचपन को दोबारा पाने का लालच होने लगा… काश की हमारा बचपन दोबारा मिल सकता…

    • vijay says:

      @anju singh,
      is baat ko hum ek aur angle sey dekh saktey hain, phir young feel karna shuru karey & believe me, its all that fun once again. I have tried & my mind now enjoys all those small things I did as a child, sirf, farak yeh hai ki ab gadgets etc jyada time le jatey hain

  4. rajdeep bhattacharya says:

    i really loved the poem

  5. Harshit Garg says:

    बड़ा प्यारा लगा पड़ कर आपकी इस रचना को…….

    आओ तुम्हे मै ले के चलूँ, उन भूली बिसरी यादों में;
    इस भाग दौड़ से दूर कंही, बचपन की उन बातों में

  6. Preeti says:

    I too missing now all these vijay Ji bahut sunder

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