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आगत और विगत

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Hindi Poetry

आगत और विगत के

कितने ही चित्र

उभरते रहे

और मैं दौड़ता रहा

उन के पीछे

तृषित और आकुल सा

क्योंकि वे सब

मरीचिका ही तो थे

क्यों कि दोनों ही वायवीय ही थे

विगत भी और आगत भी

क्यों कि विगत के चित्र तो

बीत चुके थे

वे अब नही थे वर्तमान

और आगत अभी

गर्भस्थ था ही

नितांत निर्हस्त गत

वर्तमान में ||

12 Comments

  1. Vishvnand says:

    सुन्दर रचना भावपूर्ण चयन
    वाचन आनंदमय मनभावन
    हार्दिक अभिनन्दन

  2. siddha nath singh says:

    सुन्दर प्रस्तुति.

  3. sushil sarna says:

    रचना मनभाई-सुंदर भावपूर्ण प्रस्तुति-हार्दिक बधाई डॉ साहिब

  4. pallawi says:

    आगत और विगत के

    कितने ही चित्र

    उभरते रहे

    और मैं दौड़ता रहा

    उन के पीछे

    तृषित और आकुल सा !!
    बोहुत अच्छी पंक्तिया बोहुत भाई !!

    • dr.ved vyathit says:

      @pallawi, पल्लवी यही जीवन की सच्चाई प्रतीत हुई है
      आप का आभार है

  5. Harish Chandra Lohumi says:

    बहुत ही सुन्दर और परिपक्व प्रस्तुति ! बधाई डा.साहब !

  6. sunder shabdo ki motiyon se sajai hai aap ne ye rachna–badahai

    • dr.ved vyathit says:

      @rajiv srivastava, मेरे लिए तो आप बहुमूल्य मोती हैं जो सदा मेरे हृदय की गराइयों में बसे हैं
      हार्दिक आभार है

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