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गो एक उम्र हुई आप को इधर से गए.

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Hindi Poetry
चढ़े थे जो भी  मुलम्मे सभी उतर से गए.
नज़र उतारने वाले उतर नज़र से गए.
 
ख़ला खिंची है तेरे मेरे दरमियान वो अब,
कि निस्बतों के भरम खुशफहम बिखर से गए.
 
फिजां में अब भी घुली आप की हरारत सी,
गो एक उम्र हुई आप को इधर से गए.
 
जुदा हुए तो कहीं दूर जा पड़े पत्ते,
न पूछने भी कभी हाल फिर शजर से गए.
 
हवा के हाथ हुनरमंद थे न कुछ ऐसे, 
नुकूश रेत पे हैं खुद ब खुद उभर से गए.
 
वो अब्र शौक़ से करते थे जो ज़मीं सैराब,
वो अब्र देर हुई लौट इस शहर से गए.
 
तबीब तेरा  तरीक़ा ए  तिब निराला था,
मरीज़ तेरी दवा ले के और मर से गए.
 
हवा ने आके जड़ा तंज कौन सा चुभता,
जो लौ लरजने लगी है, चराग डर से गए.
 
तुम अपने हुस्न पे नाजां हम इश्क पे मगरूर,
तअल्लुकात  में घुलने थे ,घुल ज़हर से गए.
 
चले गए हो नज़र फेर के इधर से तुम,
उजाले साथ तुम्हारे ही बामो दर से गए. 
 

8 Comments

  1. dp says:

    तबीब तेरा तरीक़ा ए तिब निराला था,
    मरीज़ तेरी दवा ले के और मर से गए.
    गज़ब सर जी …।

  2. Harish Chandra Lohumi says:

    बहुत अच्छे एस एन साहब ! क्या जज़्बा है !!
    कठिन शब्दों के अर्थ हमको “होम-वर्क” के लिये दे दिये हैं क्या ! 🙂

    • siddha Nath Singh says:

      @Harish Chandra Lohumi, मुझे शब्द सामान्य लगे थे, निस्बत- सम्बन्ध, हरारत-ऊष्मा,तबीब-चिकित्सक,तिब-चिकित्सा,अब्र-बादल,खला-शून्य,नुकूश-छवियाँ ,नाज़ां-गर्वित,तंज-व्यंग्य, लीजिये अर्थ दे दिए.

  3. sushil sarna says:

    हर शेर लाजवाब-हुस्न-ऐ-गजल लजवाब-अंदाज-ऐ-बयाँ लजवाब, मजा आ गया-हार्दिक बधाई सिंह साहिब

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