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नींद को फिर वो राह दिखा दो.

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Hindi Poetry
दिल के शहर में सक़ता खिंचा है     सक़ता-सन्नाटा  
आके ज़रा तुम इसको जगा दो.
 
कब से पड़े हैं फूल फ़सुर्दा,     फ़सुर्दा-मुरझाये हुए
इनको बहारों से तो मिला दो.
 
भूल गयी ख्वाबों का रस्ता,
नींद को फिर वो राह दिखा दो.
 
थक मैं चुका हूँ चलते अकेले,
 साथ चलो, मत और सज़ा दो.
 
धुंधला पड़ा है चाह का चेहरा,
इसको संवारो,ताबो ज़िया दो.   ताबो जिया-उज्वलता
 
आग दबी है राख में अब तक,
सोच समझ के इसको हवा दो.
 
सब सन्देश पहुँच जायेंगे,
मन से मन के तार मिला दो.
 
हद्दे फलक वो खुद छू लेगा,   हद्दे फलक-आकाश की सीमा
बस पंछी के पंख न बांधो.
 
पीठ पे बस्ता फिर धर लेना,
पहले इल्म की प्यास जगा दो. 
 
 
 

8 Comments

  1. Vishvnand says:

    बढ़िया अंदाज़, बढ़िया हर शेर, मन भाये

    बहुत ले रहें है रिश्वत ये नेता
    रिश्वत न लें ऐसी इनको दवा दो …….

  2. Reetesh Sabr says:

    सक़ता, फ़सुर्दा, ताबो-ज़िया, हद्दे-फलक…(आज का मेरा अलफ़ाज़-ए-इज़ाफ़ा)
    सीखने के इस मदरसे में, एक शुक्रिया कुछ यूँ…
    “इल्म की प्यास जगा जाती है,
    बिला बस्ता ही सिखा जाती है”

  3. Raj says:

    बहुत खूब सिद्ध नाथ जी.

    • siddha nath singh says:

      @Raj, बहुत दिनों पर पड़े दिखाई स्वागत है फिर सखे आप का.शब्द प्रशंसा के जो भेजे उसका शुक्रगुजार हुआ मैं.

  4. Abhishek Khare says:

    बहुत खूब सर जी

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