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बरसों के बाद आप मिले भी तो किस तरह

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Hindi Poetry
बरसों के बाद आप मिले भी तो किस तरह
जैसे कि अजनबी से  सफ़र  में मिले कोई.
 
ये मुस्तकिल तलाश न अंजाम पा सकी,
चाहा  तो था कि अपना शहर में मिले कोई.
 
भर जाते ज़ख्मे रूह महज़ मिल के आप से,
मरहम सुकूनसाज़ नज़र में मिले कोई.
 
रह रह के तल्ख़ हो रहा माहौल बज़्म का,
गुपचुप चलाये तीर ज़हर में मिले कोई.
 
करते हैं वाह वाह,हसद से मगर निगाह,
ये ढूंढती है नुक्स हुनर में मिले कोई.
 
बुनता तो आशियाँ हूँ मगर ये भी खौफ है,
कोटर में सांप भी न शजर में मिले कोई.
 
अपना के कुल शहर को कहाँ मुत्मईन हैं हम,
खदशा है गैर खुद ही न घर में मिले कोई.

10 Comments

  1. Abhishek Khare says:

    अच्छी रचना सर जी, बधाई |

  2. Abhishek Khare says:

    तलाये को चलाये होना चाहिए शायद | ४ सितारे |

  3. Harish Chandra Lohumi says:

    अच्छी गज़ल ! बधाई !

  4. Vishvnand says:

    बहुत अच्छे, मन भायी

    “ये मुस्तकिल तलाश न अंजाम पा सकी,
    चाहा तो था कि अपना शहर में मिले कोई.”

    हम से मिलना तो कोई मुश्किल न था
    आप दूसरे रस्ते में भटक गए थे कोई …. 🙂

    • siddha Nath Singh says:

      @Vishvnand, भटकने का अलग आता मज़ा है, किSI से पूछ लो कितना बजा है, कहेगा वक़्त अब आया तुम्हारा, समय से दूर हो ये ही सजा है.

  5. prachi sandeep singla says:

    awesome 🙂

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