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बुरे, अच्छे थे, जो थे, सामने थे.

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Hindi Poetry
बजाहिर गो वहां साए घने थे
मगर पोले दरख्तों के तने थे.
 
वही आँखें नज़र अंदाज़ क्यूँ हैं
कि जिनके अश्क उनको पोंछने थे.
 
बुराई थी कोई हममें तो ये थी
बुरे, अच्छे थे, जो  थे, सामने थे.
 
अगरचे नाच राधा जानती थी
मगर आँगन ही सब टेढ़े बने थे.
 
इशारे दे रहे शातिर ज़हन थे,
न यूँ ही हाथ पुतली के तने थे.
 
उन्हें करनी महज़ थी रस्म अदाई,
उन्हें कब हाल अपने जानने थे.
 
बहाना  सिर्फ था इन्साफपरवर!
मुक़दमें तो मुखालिफ सब बने थे.  

2 Comments

  1. Harish Chandra Lohumi says:

    सहूरों को नहीं पहचानते जो,
    वही तो अब वहां काबिल बने थे । 🙂
    बहुत अच्छ एस एन साहब ! बधाई !!!

  2. सुन्दर रचना , काबिले तारीफ है – बधाई

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