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विडम्बना

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Hindi Poetry
जिंदगी की उहापोह ने, मुझे भी थका डाला
बहुत मजबूत हुआ करतीं थी वह जड़ें, 
जिनकी शाखों को आज फलों ने झुका डाला, 
वृक्ष बनकर साया देने की तमन्ना ले,
हर घड़ी जीवन की, खिली मुस्कान पर लुटा दी,
आज उन्ही मुस्कुराते चेहरों ने मेरी जड़ें सुखा दीं।
क्या येही रीति और रस्में हैं जो पीढ़ी निभाती हैं
जन्म देने वाले का ही अस्तित्व मिटाती हैं ।

4 Comments

  1. siddha Nath Singh says:

    yaksh prasn hai kya uttar den.
    shankaon ko kaise svar den
    roop naya pati hai jad,jab,
    naye fool gulshan ko bhar den.

    • nitin_shukla14 says:

      धन्यवाद सिंह साहब कविता के मर्म को उसके सही रूप में समझने के लिए.

  2. Harish Chandra Lohumi says:

    बदला बदला अंदाज़ ! लेकिन जूनून वही !
    क्या बात है नितिन जी !
    मंच पर आपकी गद्दी कब से बाट जोह रही थी आपकी !
    पुनः हार्दिक स्वागत है आपका !

    • nitin_shukla14 says:

      हरीश जी कोटि कोटि प्रणाम एवं धन्यवाद, काफी समय से इस मंच की कमी महसूस हो रही थी जीवन में, अंततः वापस आने का अवसर मिल ही गया

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