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“कहीं देश न बिक जाये”

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Hindi Poetry

दबे पैर चलने की आवाज़ आई,

फटे चीथड़े में बूढी दुखियारी आई

बोली बाबू जी हूँ तीन दिन से भूखी,

नहीं दी, किसी ने एक भी रुखी सूखी

यह कहते-कहते, उसकी आवाज भर्राई,

लटकी सी आँखों में थी नमी छाई

दफ्तर  के बाहर खड़े चपरासी ने बोला,

पास पड़े झोले में टिफिन को खोला,

अम्मा मैंने अभी सारा खा लिया है,

धोकर टिफिन को पानी पी लिया है

अन्दर आ जाओ, शायद बड़े बाबू  कुछ दे दें,

न हो बचा, तो शायद पैसे से ले दें

बड़े बाबू चौड़े हो, मूछों पर ताव दे रहे थे,

फाइलों के बीच छुपकर खाने का मजा ले रहे थे,

बूढी भिखारिन को आता देख बोले,

मैं तो आज बीवी को मायके भेजकर आ रहा हूँ,

तभी, शर्मा जी को खाने में हाँथ बटा रहा हूँ,

एक काम करो साहब से मिल लो,

बड़े सारे स्वादिष्ट भोजन हैं लाये,

शायद तुम्हे उसमे से कुछ मिल जाये

साहब केबिन में कुर्सी घुमाकर ,

तिरछी सी आँखों पर चश्मा चढ़ाकर,

बड़े स्वाद से चटकारे लेकर खा रहे थे,

साथ साथ ही तोंद अपनी सहला रहे थे

बूढी अम्मा को देख नज़र फेर ली,

आँखों की चमक ने बीमारी घेर ली,

कैसे दूं अम्मा जूठा हो गया है,

कल पता चला मुझे टी बी हो गया है

जूठा खिलाना तो बिलकुल मना है,

यह रोग तो बहुत ही जटिल और घना है

सारे बहाने सुन अम्मा जब बोली,

उसने तो सबकी थी, हर एक पोल खोली,

बोली, मैं कोई भिखारिन नहीं हूँ

पढ़ी लिखी हूँ, गंवारिन नहीं हूँ

मेरी इस हालत के तुम सब कारण हो,

विधवा  अकेली  मैं पेशन  मांगने आती थी

हर बार कुछ न कुछ बेचकर, रिश्वत दे जाती थी,

बरतन बिके , कपडे  बिके, घर का हर सामान बिका,

फिर भी तुम्हारी नज़र को वोह पैसा कम दिखा

आज जब मैं फटे हाल हूँ, तो तुम्हे मुझे पहचान भी न पाए,

लोगों के तन से नोचकर भी अपना पेट न भर पाए

जो रोग तुम्हे लगा है, वोह सबसे जटिल है,

तुम सबकी मानसिकता इतनी कुटिल है,

कि तुम अपनी माँ को भी बेचकर, जेबें भर सकते हो,

मरते हुए इन्सान से भी रिश्वत मांग सकते हो

तुम्हारी इस रिश्वतखोरी ने, न जाने कितने घर जला डाले,

सुख चैन छीन लिया, पड़े रोटी के लाले

यह भर्ष्टाचार  का रोग देश को खा रहा है,

हमारी बुनियाद को जड़ से हिला रहा है

अभी समय है हम सब चेत जाएँ,

निस्वार्थ भाव से इस कार्य में लग जाएँ

ऐसा न हो कि बहुत देर हो जाये,

और रिश्वत के नाम पर यह देश बिक जाये

 

 

10 Comments

  1. Mona says:

    Its really amazing.. A true pic of present scenario which was our past and will remain same if people will be like that only……

    Great Sir, Nice contribution.

  2. Vishvnand says:

    बड़ी सुन्दर मार्मिक रचना
    मुझे लगा वो महिला है आम जनता
    और जिनसे मिली वो अधिकांश रिश्वतखोर सरकारी नौकर और मंत्री पार्टियों के नेता
    जिन्होंने स्कैम और रिश्वतखोरी से देश और देशवासिओं को है लूटा
    खुद बिक गए हैं और देख रहे देश को बेचने का सपना
    जिन्हें अब जल्द ही जनता देने वाली है न्याय और जेल का खाना ….

    देर बहुत कर आये हो, रचना सुन्दर लाये हो
    चाह रहे हम p4p पर आप हरदम बने रहो…

    • nitin_shukla14 says:

      धन्यवाद सर
      आपने बिलकुल सही सोचा, और अब सही समय आ गया कि हम इन सामाजिक बुराइयों का डट कर सामना करें नहीं तो परिणाम कुछ भी हो सकता है

  3. Harish Chandra Lohumi says:

    आदरणीय विश्वनंद सर से पूर्णतः सहमत !
    जन हित और देश हित में एक चिंतन ! बधाई !

    • nitin_shukla14 says:

      धन्यवाद स्वीकारें हरीश जी, अपना स्नेह यूँ ही बनायें रखें

  4. PRIYA_2010 says:

    bahut khub,
    acha laga ki aap fir se likhne lage hain,,,

  5. Mehar Singh says:

    गजब की व्यथा

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