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जब मुझे मिला सम्मान

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Hindi Poetry

 

जब मुझे मिला सम्मान 

 

जब मुझे मिला सम्मान

शख्स एक हुआ हैरान.

हुआ वो हैरान और  परेशान

 तो लगा पूछने मुझसे  / क्या किया है तुमने ,

क्यों मिला है सम्मान ?

क्या है इसका गणित / हमें  भी बतलाओ 

हमें भी समझाओ / साहित्य के वो सूत्र  

सम्मान तक पहुँचता है  / जिनका हल 

क्योंकि… 

मुझे भी तो पाना है सम्मान / आज नहीं तो कल 

आखिर क्या लिखते हो / क्या करते हो 

हमने तो नहीं देखा तुम्हें / कभी.

 कुछ लिखते / कुछ करते 

सुन कर मैं मौन रहा कुछ देर 

मन ही मन रहा सोचता / कि आखिर 

क्या ज़वाब दूँ इसे

मन में  आया एक बार / कि कह दूँ 

सीधा और स्पष्ट कि /  अगर नहीं देखा है तुमने

मुझे ऐसा  कुछ करते / कि मुझे मिले सम्मान 

तो बता दो अपने धर्म-ईमान से / कि

तुमने मुझे  / दिया ही कब है  सम्मान ?

पर नहीं / नहीं कहा मैंने उससे

 ऐसा कुछ भी 

बस पूछा सिर्फ  इतना / कि 

अगर चाहते  हो  पाना  सम्मान

तो क्या करते हो सम्मान का  सम्मान ?

क्या समझते  हो   संचार – प्रक्रिया  ,

क्या साहित्य  से जुड़ने  का  भी

रखते  हो  कोई  ज़रिया ,

आखिर क्या है समाज के प्रति

तुम्हारा नजरिया ?

 शिक्षित होने का दंभ भरते हो

क्या जानते  हो  चलाना  कम्प्यूटर ,

क्या कर सकते हो कम्प्यूटर पर

लोगों से बात ?

अगर नहीं तो क्या सीखने  के  लिए

 रखा  हुआ  है कोई  ट्यूटर  ? 

क्या करते  हो शहीदों को नमन कभी ,

क्या  करते हो समाज की कोई  सेवा ?

सबका  ज़वाब मिलानहीं

तो मैंने  समझाया उसे

 बड़े प्यार से / कि

अगर नहीं जानते  इनमें  से कुछ भी ,

और नहीं चाहते  सीखना भी ,

तो नहीं आएगा….

 यह गणित /  तुम्हारी समझ  में

क्यों  ?

क्योंकि  यह  युग  है संचार  का

और संचार  के   इस  युग  में 

जो  नहीं जनता  कम्प्यूटर  की भाषा

वो  पढ़ा – लिखा भी अनपढ़  है

भले  ही  पास  उसके हो /  डिग्रियों  का  ठाठ

पर  असल  में  वो है  सोलह  दूनी  आठ 

क्योंकि  वो  ..

सुन  कर  बात  मेरी  वो  मौन  हुआ

बाहर से था  मौन  / मगर….
अंदर  से बोल  रहा था

सुन  बात  सच्ची 

 खून  उसका  खौल  रहा  था 

वजन  से अपने / वो  मेरा  वजन  तोल  रहा  था

पर  यह  भी गलती  थी  उसकी

क्योंकि /  मेरा  वजन  मुझमें  नहीं  

मेरे  साहित्य में  है

तभी  तो / मुझे सम्मान मिला  है 

पर  / यह  बात  उसे  समझाए  कौन 

कैसे  मिला  है सम्मान / उसे  बताए  कौन  ?

आप  बता सकते  हों / तो बता देना.

वरना  वक़्त  तो बताएगा  ही.

पर वक़्त आने में भी / वक़्त लगता है

और वक़्त के साथ

बहुत कुछ बदल जाता है

इसलिए क्रिया की प्रतिक्रिया

भी तभी हुई / जब मुझे मिला सम्मान

आनंद  प्रकाश  ‘आर्टिस्ट ‘

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6 Comments

  1. Vishvnand says:

    बहुत सुन्दर रचना और विवेचन,
    हार्दिक बधाई.

    रचना पढ़ जो विचार मन में आये वही लिख रहा हूँ
    याद है मुझे मिला था सन्मान, जब मेरा काम सन्मान के काबिल न था .
    सन्मान देने का कारण मैं बहुत देर बाद समझा कुछ और था
    जब मेरे काम सन्मान के सचमुच योग्य थे सन्मान किसी और को दिया गया था
    यहाँ भी न मिलने का कारण सन्मान नही कुछ और था
    दूसरों ने दिए सन्मान की ख़ुशी क्षण भंगुर होती है
    और लोगों को उसके पीछे भागने बेकार को प्रवृत करती रहती है
    मीडिया और टीवी में जो सन्मान दिखाते हैं वो 99% नकली और हमें उल्लू बनाना होता है
    खुद को खुद के कार्य से सन्मानित रख खुश रखना ही अपना और सन्मान का सच्चा सन्मान करना है
    क्यूंकि भगवान के पास हमारे सारे कामो का लिखा जोखा रहता है
    उसी पर हमारा यह और अगला जीवन भी पूर्णतया निर्भर रहता है
    बाहरी सन्मान की फिक्र अच्छी बात नही है और जरूरी भी नहीं …

    • ANAND PRAKASH ARTIST says:

      @Vishvnand,
      शुक्रिया विश्वनंद जी , रचना आपको पसंद आई यही मेरा और मेरी रचना का सबसे बड़ा सम्मान है . आपके विचारों से मै भी सहमत हूँ ,सम्मान को लेकर मिडिया में बुरा हाल है,पर कई बार नवोदितों के प्रोत्साहन के लिए यह आवश्यक भी हो जाता है कि उन्हें किसी मंच पर सम्मानित करके उनका उत्साह बढाया जाए .अगर हम सम्मान के पीच्छे भागने लगें तो शायद अपने लक्ष्य से ही भटक जाएँ .हम (लेखक लोग ) अपने काम में लगे रहते हैं ,इस काम के अनुरूप समय पर सम्मान नहीं मिलता है ,मिलता है तो इतनी देर से कि उसका कोई विशेष महत्व नहीं रह जाता है .किन्तु इस पर भी कुछ लोगों को जलन होती है ,लेखक को निरुत्साहित करने की कोशिश करते हैं .ऐसे ही लोगों के लिए एक ज़वाब और नवोदित लेखकों को उनकी परवाह न करने की प्रेरणास्वरूप लिखी गई है मेरी यह कविता .आशा है अन्य मित्र भी इसे पसंद करेंगे और अपनी प्रतिक्रिया देंगे ..

    • amit478874 says:

      @Vishvnand, बिलकुल सच बात कही आपने सरजी…! इंसान जब अपने आप की नजरो में सन्मानित हो जाए तो किसी दिखावे की ज़रुरत नहीं होती…! मेरा तो यही मानना है कि सन्मान पाने के लिए सब के लिए हमारी नज़रों में मान होना चाहिए..! 🙂

  2. amit478874 says:

    बहुत ही बढियां रचना आनंद साहब..!

    • Anand Prakash Artist says:

      @amit478874,
      प्रत्युत्तर एवम प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद अमित जी !

  3. I like your poem. Great work…..

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