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धन और दौलत – मरण के मुहूरत

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Hindi Poetry
पैदा नर का रूप लिया
कायदा कानून साथ जुड़ा
फ़ायदा मन के राह लिया
जायदाद जागीर जोड़ दिया

दया को धन में गोंध दिया
दिशा का वश में रोंद लिया
दुनिया दारी में मन बदला
लोभ और मोह में दिन निकला

बुढ़ापा बढती देह हुवा
खड़ा है यम की धूत बुला
छोड़ो सभ कुछ यहीं कहला
बिचड़ा है अब बुढ्ढा अकेला

कचड के खुस्थी में बछड़ा निकला

2 Comments

  1. sandeep says:

    mein is test kar raha hoon

  2. Vishvnand says:

    हिंदी में शब्दों की बहुत सारी गल्तियाँ
    posting ऊटपटांग लगती है

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