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बड़ा ही तंग गला है तेरी सुराही का.

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Hindi Poetry
जो रोशनी में करूँ ज़िक्र रूसियाही का.    रूसियाही- काले मुंह, कुकर्म
गिला उन्हें हो बहुत मेरी कम निगाही का .   कम निगाही-दृष्टि बाध्यता
 
है दाग़ दाग़ ये दामन, ज़माने वालों को,
यकीन कैसे दिलाऊंगा बेगुनाही का.
 
खुद अपने आप से हारा हूँ, दोष दूँ किसको,
अमल खुद  अपना सबब है मेरी तबाही का.   सबब-कारण, amal-karm 
 
मैं कब से मील का पत्थर बना खड़ा, शायद-
बता सकूँ मैं पता रहबरों को राही का.   रहबर-मार्गदर्शी
 
मैं कैसे मानूं मयस्सर सभी को होगी मय   मय- शराब
बड़ा ही तंग गला है तेरी सुराही का.
 
वो अपनी जड़ से कटा है, कहीं न जाए सूख,
गुरूर जिसको बला का है सरबराही का .  सरबराही-सत्ताधीश होना
 
खिलाफ अपने गया फैसला है मुंसिफ का,
ये ख़ामियाज़ा मिला सच की है गवाही का.   ख़ामियाज़ा-दुष्परिणाम
 
ज़रूर ले के छुरी वो बगल में आया है,
वो कर रहा बहुत इज़हार खैरख्वाही का. 

2 Comments

  1. Harish Chandra Lohumi says:

    निष्पक्ष्य रूप से निर्णय लिया जाय तो उम्दा और काबिल-ए-तारीफ़ !!!

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