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“राज”

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Hindi Poetry
“राज”
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राज की बात है सुनो ज़रा जो सुनी नहीं हो अब तक,
राज तो तब से चला आ रहा न जाने चलेगा कब तक ?
राजा चले गए कभी के पर आज तक गया नहीं ये राज,
राज का ताज़ अब लगे पहनने गलियारों के सरताज़ !
धन-बल और दल-बल के बूते पर आते जीतके चुनाव,
राजपाट तक पहुँचने हेतु चुनाव ही इक थलचर नाव !
राज भवन में भी छुपा हुआ है जो अटल शब्द है ‘राज’,
दराज़ में भी राज, महाराज में भी राज, नाराज में राज,
हमराज में राज, स्वराज में राज, और गैराज में भी राज,
राजपाल में राज, राजभवन में राज, राजस्थान में राज,
राजधानी में राज, राजकोट में राज, राज़दार में राज,
यमराज में राज, धर्मराज में राज, राजगीर में भी राज !
जब तक शब्द ये राज छुपा रहेगा राजा भी रहेगा कोई,
ढूंढो युक्ति कोई यदि हो इसे हटाने की जैसी,जोई सोई !
तभी हटेगी भाव वृत्ति राज की और होगा जन-स्वशासन,
राज का भाव तभी मिट पायेगा, ये है प्रायोगिक आश्वासन !
राजभवन, राष्ट्रपति भवन, राज्यसभा का रखरखाव-व्यय आज है राजशाही,
सांसदों, विधानसभा सदस्यों के उच्च रहन-सहन की अब हो गई है शहंशाही !
राजा-महाराजाओं की तुलना में उनका व्ययभार हुआ है कई गुना ,
पश्चाताप की बात अब यही कि क्यों उन्हैं हटाया और इन्हैं चुना ?
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