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दिन बच गए हैं चार गिनूँ उँगलियों पे मैं.

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Aug 2011 Contest, Hindi Poetry

दिन बच गए हैं चार गिनूँ उँगलियों पे मैं. 
लेखा उमर का रखती रही झुर्रियों पे मैं.
 
जो लौट के न आयगा उस वक़्त की फ़क़त
तकती हूँ राह बैठ यूँही खिडकियों पे मैं.
 
कुछ दाग हैं दिवार पे कुछ दिल पे हैं लगे,
कितनी बता रहें हैं रही किश्तियों पे मैं.
 
पीछे गयी है रात है माथे पे अब सुबह,
गिन लूँ तो भूल पाऊँ सभी गलतियों को मैं.
 
आँखों से देखती हूँ दिखे सिर्फ पास का,
जाना है दूर ढूढ़ रही साथियों को मैं. 

5 Comments

  1. Vishvnand says:

    बहुत सुन्दर

    सालों में इने गिने दिन ही खुशी के मेरे
    छुट्टियों में जो पाऊँ पास बच्चो को मैं

  2. shakeel says:

    बहुत बेहतरीन दर्द का मुजाहिरा किया आपने ढलती उम्र का ये चढ़ता हुआ दर्द वाकई काबिले तारीफ़.

  3. P4PoetryP4Praveen says:

    यह सिर्फ़ कविता नहीं, सच का आईना है,
    वृद्धावस्था का एक-एक पल लगता महीना है…
    दादा (विश्व) की बातों में भी दम उतना है…
    शकील जी ने समझा देखो रचना को कितना है.

    बहुत-बहुत बधाई! 🙂

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